मीनाक्षी भालेराव की कविताएँ

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ख्वाहिशें

हजारों ख्वाहिशें लेकर चल मुसाफिर  दिल में

न जानें किस मोड़ पर मुकद्दर मेहरबान हो जाये

जो तुझको इल्म ही नहीं अपनी मंजिल का

तो खुदा भी कुछ ना दे पायेगा तुझे राही

जिस तरह ख़ाली हाथ तू आया था मुसाफिर

उसी तरह ख़ाली हाथ ही तू चला जाएगा

इतना भी बेमकसद जिन्दगी ना जी तू

खुदा तुझे देना चाहे और तू हाथ भी ना उठा पाए

कर अपनी चाहत को इतना बुलंद तू के  

खुदा तेरी झोली उम्मीद से ज्यादा भर दे

 

उजड़ा वतन

शाखों से टूट गये

पत्ते चनार के ये

कैसा तूफान था

बिया-बां हो गया

अचानक चमन

कल जहाँ आबादी

खिलखिलाती थी

आज वीराने मायूसी से

आंसू बहा रहें हैं

ये कैसा सवेरा है

जो रात सा लग रहा है

शायद आसमान भी

जमी के घायल तन

को ना देख सका हो

कुछ तो करें जतन

आओ के धुंआ-धुंआ

है हमारा चमन

यूँ ही गर उजड़ता रहा

हमारा ये वतन

ये फिर ना कहलायेगा

सारे जहाँ से ऊंचा

हिन्दुस्तान हमारा

 

माँ

माँ तुम कितनी अपनी होती है

सारे रिश्तों से भी बड़ी होती हो

तेरे आँचल की छांव में हम

कितने महफूज और खुश रहते हैं

तुझ बिन हर दिन सुना और

रात अँधेरी-अँधेरी  होती है

तू ही रौशनी से नहलाती है

तू ही हम को राह दिखाती है

तू ही मंजिल पर पहुँचाती है

तेरी ममता से जो वंचित

रहते हैं जो हे माँ उन बच्चों को

कैसी पीड़ा होती होगी

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कसूर

क्या कसूर है मेरा

जो तुम खफा-खफा से रहते हो

मेरी जुल्फों को जो हवा छू लेती है

मेरे आंचल को घटायें उड़ाती है

बूंदें ये जो बारिश की है

जिस्म मेरा चूम लेती है

तो नजारों की नजरों में भी

सरूर चढ़ जाता है

क्या कसूर है मेरा

हर नजर जो उठती है मुझ पर

मेहरबान हो कर उठती है

मेरी हंसी पर कायनात

भी रश्क करती है

क्या कसूर है मेरा

घर से जब निकली हूँ

न जाने कितनों का दम निकलता है

आहें भर-भर कर

छूने की हसरत करते हैं

क्या कसूर है मेरा जो

तुम खफा-खफा से रहते हो

 

मेहँदी

मेहँदी  मेरे हाथ रची थी

जैसे पिया की मुस्कान बसी थी

सपना मेरा एक सजा था

नैंनों में कजरा लगा था

द्वार पर ध्यान बंटा था

मन में मेरे अरमान जगा था

मेहँदी ------------------------

 

सिरहाने बैठ कर कोई

जैसे सहलाने लगा था

तनमन में सिहरन सी उठी

वो आये ऐसा लगा था

मेहँदी-------------------------

 

बुझ गया दिया और

धुंआ सा उठने लगा था

क्या बात थी उस आलम में

तनमन मेरा महक उठा था

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दीदार

तुम्हारे दीदार से

सहारा मिल ही जायेगा

मेरी बाहें थामे चलो

किनारा मिल ही जायेगा

यों ना उदास रहो तुम

जमाने की बेरुखी से

तुम्हारी हंसी से

जमाना बदल ही जायेगा

निकल आओ अंधेरों से

उजाला राह तकता है

नया सवेरा आएगा

गमों की रात ढलती जाएगी

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1 टिप्पणी "मीनाक्षी भालेराव की कविताएँ"

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