शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

मुरसलीन (साकी) की ग़ज़ल

 


ऐ जिन्‍दगी इससे बुरा क्‍या हाल होना है।
जिसे पाया है मैंने अब उसे इक रोज खोना है ।


ये माना हंस रहा हूं मैं,मगर दिल में तड़प सी है
कई नासूर जिन्‍दा हैं, मगर फिर जख्‍म खाना है।


इसी रंगीन दुनिया में कई बेनूर बस्‍ती हैं।
उसे मिलती भी इज्‍जत है जिसे सूली चढ़ाना है।


ऐ मुसाफिर रस्‍सियां फिर बांध ले अपनी
इन्‍हीं कमजोर लहरों में अभी तूफान आना है।


वह सुन ले जो समझ बैठे हैं पैसों को खुदा अपना
सिकन्‍दर की तरह उनकेा भी खाली हाथ जाना है।
 
मुरसलीन (साकी)
जिला लखीमपुर खीरी यू.पी.

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