शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

देवेन्द्र पाठक 'महरूम' की ग़ज़ल

ग़ज़ल/                    

(ब्रितानी नववर्ष 2011के आगमन पर) 

 

अश्क-ए-ख़ून बहाकर  ये गुज़र जाएगा।      
वो जो आएगा वो भी अश्के ख़ूँ बहाएगा॥ 

 
अब कहीँ फेरो-बदल के कोई आसार नहीँ; 
जलेगा रोम नीरो बाँसुरी बजाएगा॥     


तरकशो-तीर वही होँगे पर शिकारी नए;
अदमरोँ शिकार फिर से किया जाएगा॥     

 
हम जिसे कर रहे हैँ आज अलविदा वो ही; 
फिर नए ज़ुल्म नई शक्ल मेँ वो ढाएगा॥

 
हादसा होगा नए नाम से कोई 'महरूम';    
जख़्म पपड़ाया हुआ फिर हरा हो जाएगा॥   

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