मंगलवार, 29 नवंबर 2011

अमर शहीद लाला लाजपतराय की याद में त्रिभाषी कवि सम्‍मेलन

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चण्‍डीगढ़ ः भारतीय साहित्‍य परिषद (रजि0), मोहाली द्वारा तथा साहित्‍यिक संस्‍था मंथन', चण्‍डीगढ़ के सहयोग से सर्वेंट पीपल्‍स सोसाइटी', सैक्‍टर 15, चण्‍डीगढ़ के तत्‍वाधान में अमर शहीद लाला लाजपत राय जी की याद में आज 20/11/11 को एक त्रिभाषी कवि सम्‍मेलन का आयोजन लाला लाजपत राय भवन, सैक्‍टर 15, चण्‍डीगढ़ में किया गया, जिसमें मुख्‍यातिथि के रूप में सुप्रसिद्ध उर्दू शायर जनाब शम्‍स तबरेज़ी विराजमान रहे और कार्यक्रम की अध्‍यक्षता वरिष्‍ठ साहित्‍यकार जय गोपाल अश्‍क' ने की। मंच संचालन श्रीमती अर्चना देवी ने किया।

कार्यक्रम की शुरुआत में महान्‌ शहीद लाला लाजपत जी को पुष्‍प भेंट कर श्रदांजलि अर्पित की गई। तत्‍पश्‍चात जयगोपाल अश्‍क' अमृतसरी ने महान शहीद लाला लाजपत राय के जीवन व उनकी शहादत पर प्रकाश डालते हुए कहा ‘‘लाला जी ने साइर्मन कमीशन' के विरोध में आंदोलन खड़ा कर आज़ादी की जंग में एक अहम्‌ भूमिका अदा व उनकी शहादत की बदौलत ही हम आज आज़ादी में साँस ले रहे हैं।'' शहीदों के प्रति समर्पित नज़्‍म में उन्‍होंने कहा, ‘लाजपत आए लाज पत खातिर, जान हिन्‍द तों कर कुर्बान गए'

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कवि सम्‍मेलन की शुरुआत बेबी जिज्ञासा की कविता रोती दुनिया रोता देश' से हुई, तदुपरान्‍त ग़ज़लकार सुशील हसरत नरेलवी ने अमर शहीदों को समर्पित ग़ज़ल में कहा कि ‘‘छोड़ जाते हैं जहां में कुछ बशर ऐसे निशां/सदियाँ जिनके नक्‍श्‍ो-पा को चूमते थकती नहीं'', दीपक खेतरपाल ने कविता श्रद्धांजलि' में कहा कि सूखी आँखों, मौन श्रद्धांजलि, एक स्‍मारक व कुछ तस्‍वीरें', एस0 एल कौशल ने शहीदान को समर्पित अपनी नज़्‍म में शहीदों को याद किया, रश्‍मि खरबंदा ने ‘‘ एक चदरिया नेह की बुन लूँ, हों जिसमें रिश्‍तों के ताने-बाने'', मुसव्‍विर फिरोज़पुरी ने ‘‘फूल मुरझाने से क्‍या खुशबू मरती है'', पवन बतरा ने ‘‘आज़ादी मिल कुर्बानियों से'', विजय कपूर ने कविताओं के माध्‍यम से आज़ादी के तीन रूपों को बखान किया तो राजेश पंकज ने कविता घर' में कहा कि ‘‘मैं रहता था तेरे घर/तेरा घर था मेरा घर''। इन सभी कवियों की रचनाओं को भरपूर तालियों से नवाज़ा गया।

तत्‍पश्‍चात कवयित्री उर्मिला कौशिक सखी' ने अपनी कविता के ज़रिये कुछ यूँ भाव व्‍यक्‍त किए ‘‘क़लम से हथेली पर बनाकर चाँद/बिटिया ने उतार दिया मेरे आँगन ब्रहाण्‍ड'', कवि अश्‍विनी ने ‘‘चाँद में नज़र कल आई माँ'', सन्‍नी चंदेल ने कविता अभी-अभी', राहुल चौधरी ने ‘‘शमअ भी जलती है परवाना भी', सुभाष शर्मा ने पंजाबी कविता अंतर', अमरजीत अमर' ने ग़ज़ल ‘‘हमको जीवन में हमेशा इम्‍तिहां मिलते रहे/आसमां से भी परे आसमां मिलते रहे'', बलबीर बाहरी तन्‍हा ने ग़ज़ल ‘‘तस्‍कीन से जीना है तो खारों का मज़ा ले'', जयगोपाल अश्‍क़' ने ‘‘ग़मज़दा तो था मगर यूँ खुद से बेगाना न था/मैं तेरी महफ़िल में जब पहुँचा था दीवाना न था'' तो शम्‍स तबरेज़ी ने ग़ज़ल का मतला कुछ यूँ ‘‘न जाने कौन सी पगडण्‍डियों पे चलते हैं/कैसे वो लोग हैं जो सूखे में भी फिसलते हैं'' कहकर खूब वाह-वाही बटोरी।

समारोह के मुख्‍यातिथि जनाब शम्‍स तबरेज़ी ने अपने उद्‌गार व्‍यक्‍त करते हुए कहा कि ‘‘आज के युग में साहित्‍य से जुड़ने की बहुत ज़रूरत है क्‍योंकि हम अपनी जड़ों व जीवन मूल्‍यों से दूर होते जा रहे हैं। उन्‍होंने ज़ोर देकर यह भी कहा कि हमें शहीदों को याद करने के साथ्‍-साथ शहीदों द्वारा दिखाए व बतलाये गये मार्ग पर भी चलना होगा अगर आज़ादी को सही मानी में बरक़रार रखना है तो।'' अन्‍त में पधारे हुए मुख्‍यातिथि व अध्‍यक्ष महोदय, सभी साहित्‍यकार महानुभावों व साहित्‍य प्रेमी श्रोताओं का धन्‍यवाद आयोजक संस्‍थाओं की ओर से सुशील हसरत' नरेलवी ने किया।

सुशील हसरत' नरेलवी

संस्‍थापक अध्‍यक्ष मंथन', चण्‍डीगढ़ (अवैतनिक)

1461-बी, सैक्‍टर 37-बी,

चण्‍डीगढ़ ।

मो009216501966

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