शनिवार, 26 नवंबर 2011

वीरेन्द्र जैन का व्यंग्य - गोस्वामी तुलसीदास हाजिर हो...

व्यवस्थाएं खम्भों पर ही टिकी होती हैं जिनमें एक खम्भा न्यायपालिका का भी होता है जिसे नोचने की इजाजत किसी भी खिसियानी बिल्ली को नहीं होती। वैसे तो हर खम्भा अपने आप को दूसरे खम्भों से ऊपर दिखा कर इमारत को बेडौल करने में लगा रहता है पर न्यायपालिका की बात ही और है।

सभ्यता का तकाजा होता है कि झूठ या झूठ जैसा बोला जाये तो हम खम्भे को स्तम्भ कहने लगें। देव भाषा के प्रयोग से सम्वाद की गरिमा बढ जाती है जैसे नेकर वाले सुसंस्कृत गिरधर कवि राय और कबीर की लाठी को दण्ड कहते हैं, झंडे को ध्वज कहते हैं और वर्दी को गणवेश कहते हैं।

ये जो लोकतंत्र का उपरोक्त स्तम्भ है यह 1969 के पहले पुरानी रियासतों में खुद जाया करता था क्योंकि भूतपूर्व राजे महाराजों को विशेष अधिकार प्राप्त थे जिसमें यह भी एक था पूर्व राजे महाराजों पर चले प्रकरणों की सुनवाई के लिए अदालतें उनके दरबार में खुद ही जाया करेंगीं। कम्युनिष्टों से समर्थन लेने के चक्कर में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गान्धी को ये अधिकार खत्म करना पड़ा। बहरहाल यह स्तम्भ साहित्यकारों को तो हमेशा ही अपने यहाँ बुलवा कर उन पर मुकदमे चलाता रहा है। मिर्जा गालिब को जब बुलाया गया और अंग्रेज मजिस्ट्रेट ने उनका नाम पढते हुए कहा था कि असद उल्ला खाँ कौम मुसलमान........., तब गालिब ने उन्हें टोकते हुए कहा था कि आधा मुसलमान.................।

‘आधा कैसा?” मजिस्ट्रेट ने आश्चर्य से पूछा
“आधा इसलिए क्योंकि शराब पी लेता हूं, सुअर नहीं खाता” वे बोले थे।

गालिब समेत बहुत सारे साहित्यिक लोगों पर मुकदमे चले हैं पर वे उनके समय में ही चले हैं पर इधर हिन्दूवादी संगठनों के फैलाव के बाद तो मरने के बाद भी मुकदमा चल सकता है। कल मैंने सपने में देखा कि रामानुजम के लेख को पाठ्यक्रम से हटाने पर मची हाय तोबा के चक्कर में एक अदालत द्वारा गोस्वामी तुलसी दास को बुला लिया गया। अदालत ने पूछा ‘तुम्हारा नाम ?’

”तुलसी दास” उन्होंने विनम्रता से कहा
‘जात?’ फिर पूछा गया
‘उसके लिए तो मैंने पहले ही लिख दिया है कि

‘धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूत कहौ, जुलहा कहौ, कोऊ

काहु की बेटी से बेटा न व्याहवो, काहु की जात बिगार न सोऊ’
श्रीमान जब मैंने आम आदमी की भाषा में रामचरित मानस लिखी तब ब्राम्हणों ने कहा कि प्रभु चरित्र कहीं भाखा में लिखा जा सकता है जिसे नीची जातियां भी बोलती हैं, वह तो देवभाषा में ही लिखा जा सकता है। इस रामचरित मानस को लिखने वाला ब्राम्हण हो ही नहीं सकता। सो मैंने अपने नाम के आगे से गोस्वामी हटा लिया।

‘काम क्या करते हो?’ अदालत ने फिर पूछा
‘माँग के खायवो, मजीत कौ सोयवो

लैवो को एक न दैवे को दोऊ’

तुलसी दास ने पूर्व में लिखी अपनी काव्य पंक्तियों से ही उत्तर दिया

‘अच्छा सच सच कहो कि तुमने ही यह रामचरित मानस लिखी है’ अदालत ने पूछा।

‘श्रीमानजी मैं तो एक मामूली सा प्राणी हूं तथा मुझ से पहले और मेरे बाद सैकड़ों कवियों ने अपने अपने ढंग से प्रभु चरित बखाना है। मेरे बाद के एक कवि मैथली शरण गुप्त ने तो सही कहा है कि ‘राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बन जाये सरल सम्भाव्य है’। इन्होंने तो मेरी कथा में ढेरों बदलाव किये। अभी हाल ही में चित्रकूट के एक संत ने मेरी कृति में सैकड़ों दोष निकाल दिये तो मेरी कथा से कमाने खाने वाले उसके भी पीछे पिल पड़े, भले ही मुझे लगता रहा हो कि वे उतने गलत नहीं हैं।‘ तुलसी दास ने कहा।

’तो क्या तुम रामकथा को अपनी परिपूर्ण मौलिक कृति नहीं मानते हो?’
‘हजूर मैं तो पहले ही लिख चुका हूं कि -

नाना पुराण निगमागम तुलसी रघुनाथ गाथा

‘पर जो लोग विवाद पर उतारू हैं वे तो तुम्हारी ही कथा पर डटे हैं?’ अदालत ने सन्देह से देखते हुए कहा।
“क्या करें उनका धन्धा और राजनीति हमारी ही किताब से चलती है, बरना मेरा तो मानना रहा है ‘राम कथा कै मिति जग नाहीं’ अर्थात इस दुनिया में जितनी रामकथाएं हैं उनकी गिनती नहीं की जा सकती।“

‘अच्छा तो ये बात है।‘

“हाँ हुजूर, ‘रामायण सत कोटि अपारा’ अर्थात रामायण तो सैकड़ों करोड़ों अपार हैं।“
“जब अपार हैं तो उनकी कथा में भी भेद होंगे”

“पहले तो किसी ने आपत्ति नहीं की?” अदालत ने अपने आप से कहा
“पहले न विश्वविद्यालय की राजनीति थी और न ही चुनाव की राजनीति, सो ऋग वेद में कहा गया था कि – आ नो भद्रा क्रतवो यंतु विश्वत अर्थात अच्छे विचार पूरे विश्व से आने दो, तथा कालि दास ने कहा था कि-

पुराण मित्येव न साधु सर्वम
न चापि काव्यं नव मित्र सर्वम

संतः परीक्षान्य तरद भजंते

मूढः पर प्रत्येयनेय बुद्धिः
अब मैं जा सकता हूं?

‘पर अभी तुमने जो कहा है उसका अर्थ तो बताते जाओ?’ अदालत ने कहा।
‘इसका अर्थ है कि पुरानी होने से कोई चीज ठीक नहीं हो जाती और न ही नई होने से हर चीज खराब हो जाती है। संत परीक्षण करके ही चुनाव करते हैं’ इतना कह कर तुलसी दास अंतर्ध्यान हो गये।

--

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

मोबाइल 9425674629

2 blogger-facebook:

  1. bhai shree jain ka yah lekh sabhi stambo
    khambo[chahe ve khade hon ya pade ]par ek
    uttam vyang hai/sahityik bhasha avm vicharon
    par pakad ek uchkoti ke rachnakar ka lakshan
    hai jo shree jain ko sarswti mata ke prsad
    swarup prapt hai sadhuwad

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर
    बहुत सटीक

    उत्तर देंहटाएं

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