गुरुवार, 10 नवंबर 2011

जयप्रकाश मिश्र की तन्हाई की कविता - वो सड़कें ,वो शहतूश ,वो चैत की धूप

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तन्हाई की कविता-
वो सड़कें ,वो शहतूश ,वो चैत की धूप


बोलो प्रिंसी!
वो सड़कें छोटी थीं या तेज थी हमारी चाल
जो सर्र से गुजर जाती थीं
जबकि हम पैदल होते थे


प्रिंसी!
तुमने तो छोड़ दी पढ़ाई भी
अब कैसे मिलोगी
अपनी 'क्यूटी स्माइलिंग 'से सरेराह
तुम्हें याद भी होगा या नहीं
यह नाम भीं मुझे तुम्हीं ने दिया था
कि मेरी हंसी तुम्हें बहुत भाती थी
तुम्हें याद भी होगा या नहीं
वादा किया था तुमने -
जीवित रखूंगी इस हंसी को


आज प्रिंसी !
छोटी हो गई वह हंसी
इस भारी-भरकम पर्वताकार गम से
मैं नहीं जानता
तुम मजबूर थी या बेवफा
पर इस वक्त प्रिंसी !
वो सड़कें ,वो शहतूश , वो चैत की धूप
तोड़ रहे हैं मेरा किर्चा-किर्चा धैर्य
क्योंकि आज मै तुम्हारी यादों से बावस्ता हूँ.

                                     -जयप्रकाश मिश्र
ग्राम-बिजौरी, पोस्ट-गुठिना, जिला- फर्रुखाबाद -२०५३०२(उत्तर प्रदेश)

जयप्रकाश मिश्र
परिचय- युवा कवि एवं गज़लकार .जन्म- २७मार्च १९८८.दैनिक जागरण ,सन्डे पोस्ट ,उत्तर प्रदेश आदि पत्रिकाओं में कवितायें प्रकाशित.

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