जयप्रकाश मिश्र की कविता - स्विस बैंक में जमा मेरे हिस्से की जमीन


कविता


मैं जिस जमीन पर खड़ा हूँ
वह मेरी नहीं है
मेरे हिस्से है वही फुटपाथ
और चलती -फिरती सड़क

मेरे भीतर भी कुलबुलाता है झरनों का पानी
खिलखिलाते हैं हिमालय के हरे -भरे बुग्याल
कब से बसाए हूँ
हैंगिंग गार्डेन और एफिल टॉवर का सपना
पर बहुत दूर लगता है ताज महल ही

देख पाऊंगा क्या कश्मीर या रानीखेत
पक्षी होता तो जरूरी नहीं होता वीजा -पासपोर्ट
घूम ही आता देने पसार

सवाल करता एक सड़क का वाशिंदा -
पर मिलेगी कैसे ?
मेरे हिस्से की जमीन तो
स्विस बैंकों में जमा है .

                        जयप्रकाश मिश्र
ग्राम -बिजौरी ,पोस्ट-गुठिना जिला-फर्रुखाबाद -२०५३०२

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(ऊपर का चित्र कु. निष्ठा राय - कक्षा 4 थी की बनाई हुई दियासलाई की कलाक़ति)

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1 टिप्पणी "जयप्रकाश मिश्र की कविता - स्विस बैंक में जमा मेरे हिस्से की जमीन"

  1. बेनामी7:57 am

    ऐसा सत्य जो कुछ वर्षों बाद सपनों पर भी पाबन्दी लगा देता है |

    उत्तर देंहटाएं

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