शनिवार, 12 नवंबर 2011

अनीता मिश्रा की लघुकथा - पंद्रह सौ वाली भाभी जी

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"दीदी, पंद्रह सौ वाली भाभी जी दीवाली पर प्रेशर कुकर देंगी और बारह सौ वाली स्टील के बर्तन देंगी। आप भी अभी से बता दीजिए।" आशा ने बर्तन मांजते हुए कनखियों से मेरे चेहरे के भाव ताड़ते हुए कहा।

आशा कभी किसी का नाम नहीं लेती थी। उसने सबकी पहचान मिलने वाली महीने की तनख़्वाह से तय कर रखी थी। मुझे बेहद चिढ होती आशा के इस लहजे पर। अपमान महसूस होता, क्योंकि मैं सिर्फ़ पांच सौ रुपए ही देती थी। पर पता नहीं क्यों आशा खुशी- खुशी काम भी करती और अपनी सारी समस्या भी मुझे ही बताती। साथ ही ताने भी मुझे ही सुनाती थी- पंद्रह सौ वाली भाभी... हज़ार वाली भाभी...!

एरिया काफ़ी पॉश था, इसलिए आशा को इतने मिल ही जाते होंगे। मुझे लगता मैं ही शोषण कर रही हूं। इसलिए रोज ही खाना दे देती, त्योहार के अतिरिक्त भी कपड़े या अन्य सामान दे दिया करती। जितना आशा बताती, उतना मेरा गिल्ट बढ़ता। उतना ही सामान बढ़ता जाता। व्यस्तता इतनी थी कि ज़्यादा सोचने का टाइम नहीं था। बस, आशा जैसे ही शुरू होती हज़ार वाली भाभी... मैं जल्दी से कुछ देकर उसका मुंह बंद करा देती।

इधर कई दिनों से आशा आई नहीं तो मुझे तनाव हुआ कि ज़रूर कोई और काम मिल गया होगा। इसलिए पांच सौ वाला मेरा काम छोड़ दिया। उसने एक नंबर दिया था। नाउम्मीदी के साथ कॉल किया, तब पता चला कि उसका पति बीमार था, अस्पताल में भरती है। मुझे लगा अस्पताल जाना चाहिए। मैं गई तो आशा मुझे देखते ही रोने लगी। बोली- "कुछ मदद करिए, बड़ी परेशान हूं।" मेरी स्थिति ऐसी भी नहीं थी कि ज़्यादा कुछ कर सकती। इसलिए कुछ रुपए दिए और कहा कि तुम इतने बड़े -बड़े घरों में जाती हो, भाभियों से कुछ...!

तभी आशा ज़ोर से रो पड़ी और हिचकी लेते हुए बोली- "कहे के बड़े घर। सब दिखावा है दीदी। आप तो ताज़ा देती हैं। वहां फेंकने की नौबत आती है, तब मिलता है। इतना कहा कि कुछ अड्वांस ही दे दो, पर किसी ने ना दिया कि कही मैं भाग ना जाऊं पैसे लेकर...। मैं तो बस ऐसे ही आपको सुना देती थी।"

फिर उसने हज़ार वाली भाभियों को कुछ चुनिंदा गलियां दी। मैं समझ नहीं पा रही थी कि क्या करूं? इतने दिनों तक झूठ बोल कर मुझे बेवकूफ़ बनाती रही, इस बात पर अपना सिर धुन लूं या झूठ बोलने की वजह समझ कर आशा पर पर दया करूं !

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(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com  फतुहा, पटना की कलाकृति )

5 blogger-facebook:

  1. आशा की मजबूरी ही उसे झूठ बोलने को प्रेरित कर रही थी ... विचारणीय कहानी

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  2. sochne par majboor karti hai aapki kahani

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  3. वक्त क्या क्या करा देता है और क्या क्या कहला देता है मगर सब मजबूरीवश्…………संवेदनशील लघुकथा।

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  4. kamavaliyon ki apne kaam se sambandhit apni soch hai, jiska fayda bhi use milta raha. Achchi laghu katha hai.

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  5. samaaj ka asali chehara dikha diyaa lekhak ne aashaa ke jarie. shiksh prad laghu katha !

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