गुरुवार, 10 नवंबर 2011

दीप्ति परमार का आलेख : स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी खंड काव्यों में पौराणिक मिथकों की नवीन अर्थवत्ता

हिन्दू जाति बहुल देश के बौद्धिक निर्माण में पुराणों का बहुत बड़ा हाथ रहा है । जाने अनजाने यहां की एक बहुत बड़ी जनता पौराणिक देवताओं के चरित्रों और आदर्शों से प्रभावित और प्रेरित होती रही है । चेतना के निम्नतम और गहरे स्तर पर पौराणिक मिथकों का असर रहा है । इस दृष्टि से यह एक सहज सत्य है कि स्वातंत्र्योत्तर कवियों ने पौराणिक कथाओं और विश्वासों को युगबोध के स्तर पर पुनः नये ढंग से दुहरा कर या अपनी कविता में सजाकर हर युग का कवि अपनी युगानुकूल प्रवृत्ति को एक चमक प्रदान करने के लिए पुराण का सहारा लेता है । भक्तियुग में राधा-कृष्ण, राम-सीता, शिव-पार्वती आदि का सहारा भक्तों ने अपनी भावनाओं के लिए लिया था । रीतिकाल में भी रति और राग की विभिन्न क्रीड़ाओं को अभिव्यंजित करने के लिए राधा-बनवारी का उपयोग कवियों ने अपने ढंग से किया । परिस्थिति को पुराण की दृष्टि से देखने की आदत कवियों में पुराकाल से ही चली आ रही है । ऐसा इसलिए कि पुराण और विश्वास के अन्य लोक-कथा सूत्र जनमानस में रचे रहते है और उनके माध्यम से प्रकट की गई काव्य संचेतना आसानी से साधारणीकृत हो जाती है ।

स्वातंत्र्योत्तर काल में पौराणिक कथाओं के प्रयोग का स्वरूप इसलिए अधिक विचारणीय है कि आधुनिक काल में आधुनिकता न केवल समय की संज्ञा है , अपितु इससे विचारदर्शन का बोध होता है । स्वातंत्र्योत्तर आधुनिक मनुष्य का सोचने समझने का तरीका बदल रहा है । वह भावुकता से बौद्धिकता की ओर अग्रसर है । रामायण, महाभारत, उपनिषद, पुराण की अनेक कथाएँ आधुनिक युग में आकर बौद्धिक आख्याओं से सम्बन्धित हो गयी । इसी बौद्धिक व्याख्या के रूप में नये कवियों ने भी पौराणिकता को ग्रहण किया । स्वातंत्र्योत्तर कविता मोहभंग और यथार्थ के नवीनतम तीखे बोध तथा अंतर्राष्ट्रीय नवीन मूल्य चेतना की कविता है और इतिहास इसकी पृष्ठभूमि में अपना चेहरा बहुत कुछ बदल चुका है, तथापि स्वातंत्र्योत्तर कवियों ने पौराणिकता का प्रयोग अपने ढंग से किया है । इस दृष्टि से धर्मवीर भारती ने ‘अंधायुग’, ‘महाप्रस्थान’, ‘कनुप्रिया’ तथा ‘शबरी’, नरेश मेहता का ‘संशय की एक रात’, कुंवर नारायण का ‘आत्मजयी’, नरेन्द्र शर्मा का ‘द्रौपदी’, जगदीश चन्द्र का ‘शम्बूक’, नागार्जुन का ‘भस्मांकुर’ एवं दिनकर के ‘रश्मिरथी’ और ‘उर्वशी’ जैसे खंडकाव्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

धर्मवीर भारती के ‘अंधायुग’ की कथा यद्यपि महाभारत के उत्तरार्द्ध की है, पर कवि ने यहाँ आधुनिक जीवन की विसंगतियों को एक व्यापक संदर्भ देने की चेष्टा की है । महाकवि रवीन्द्रनाथ ने धृतराष्ट्र को मोहांध घोषित किया था। भारतीजी के अनुसार यह युग ही अंधायुग है । पाँच अंको के इस काव्य नाटक में कथा- कौरवों की अन्तिम पराजय संध्या से आरंभ होती है और कृष्ण की मृत्यु और उसके बाद अंधे युग की कल्पना में खो जाती है । धृतराष्ट्र युद्ध के संध्या क्षण में जान पाते हैं कि सत्य उनकी वैयक्तिक सीमाओं के बाहर भी निवास करता है । गांधारी की कटुता और विदूर के भय के बाद जहां संजय का असंमजस भरा प्रवेश है वहां अश्वत्थामा की मानसिक गांठे भी है। कुल मिलाकर युयुत्सु, संजय और विदूर अपने को ही सारी मूल्यहीनता के लिए उत्तरदायी मानते हैं। अंधायुग रह-रहकर अपने को दुहराता है और इस प्रकार प्रभु की मृत्यु को प्रमाणित करता है । ’’ यह कथा उन्हीं अन्धों की है , या कथा ज्योति की है अन्धों के माध्यम से । ‘‘ 1 ‘कनुप्रिया’ धर्मवीर भारती की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है । ‘कनुप्रिया’ की कथावस्तु का आधार मुख्य रूप से श्रीमद् भागवत पुराण से होते हुए भी उसकी संवेदना और संप्रेषणा आधुनिकता बोध से संसक्त है इसकी कथावस्तु के तीन चरण है । ‘कनुप्रिया’ में युद्ध में मानव अस्तित्व की समस्या का समाधान खोजा गया है । साथ ही राधा-कृष्ण के माध्यम से युद्ध को दो स्तरों पर दो मनः स्थितियों में देखा गया है और उनके माध्यम से युद्ध के औचित्य-अनौचित्य तथा सार्थकता और परिणाम पर विचार किया गया है । साथ ही कवि प्रेम की उदात्तता भी प्रतिपादित करना चाहते हैं । ’’ कौन था वह जिसके चरम साक्षात्कार का एक क्षण गहरा क्षण सारे इतिहास से बड़ा था सशक्त था । ‘‘ 2

‘भस्मांकुर’ नागार्जुन का एक आख्यान खण्ड काव्य है । इस काव्य में मदन दहन की पौराणिक कथा को पद्य बद्ध किया गया है । कवि जीवन के नये संदर्भो को उद्घाटित करते है । ‘भस्मांकुर’ का विशिष्ट अर्थ है- भस्म के अंकुर । मृत्यु से जीवन । जो समाप्त होता है वह समाप्त नहीं होता है । समाप्ति में ही नये जीवन का अंकुरण होता है । ’’ जयति जयति रतिनाथ, कामनानंद जिजीविषा के उत्स, सृष्टि के मूल ! जयति जयति कन्दर्प अजय-अमेय ! कौन मदन, तुमको कर सकता नष्ट ! ‘‘ 3

‘प्रवाद पर्व’ नरेश मेहता का देश के आपातकाल की प्रतिक्रिया स्वरूप लिखा गया खंड काव्य है । ‘प्रवाद पर्व’ की कथा का मूलाधार वाल्मीकी ‘रामायण’ में घोबी के द्वारा सीता के चरित्र पर उँगली उठाने की घटना को लिये हुए है । प्रस्तुत काव्य में कवि एक अनाम जन साधारण की तर्जनी के महत्त्व को प्रतिपादित करते हैं । एक प्रशासक या राजा को अपने सारे रागात्मक सम्बन्धों को तोड़कर ‘निर्गम कर्म’ की ओर प्रवृत करने का संकेत देते हैं । ’’ मनुष्य के बोलने का अर्थ जानते है ? मनुष्य के बोलने से प्रकाश आकाश से अवतरित होता है । सूर्य और सृष्टि के बीच ये राज्य ये इतिहास किसी को मत लाओ लक्ष्मण किसी को मत लाओ ऐसे ही बोलते हुए एक दिन मनुष्य निश्चित ही ईश्वर हो जायेगा ‘‘ 4

‘संशय की एक रात’ नरेश मेहता की स्वातंत्र्य युग की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है । पौराणिक आधार की दृष्टि से इस पर रामकथा का प्रभाव परिलक्षित होता है । किन्तु ‘संशय की एक रात’ के राम आधुनिक प्रज्ञा के प्रतिनिधि है । राम के संशय का कारण- सीता की स्वतंत्रता वैयक्तिक समस्या है । इसके कारण युद्ध क्यों किया जाय, जन विनाश क्यों किया जाय, युद्ध की अपेक्षा शान्ति की महत्ता निरूपित की गयी है । वैयक्तिक हित की अपेक्षा समष्टिगत हित का औचित्य माना है । साथ ही राम सत्य चाहते है- मानव का मानव से सत्य । ’’ मैं सत्य चाहता हूँ युद्ध से नहीं , खड़ग से भी नहीं मानव का मानव से सत्य चाहता हूँ । ‘‘ 5

‘द्रौपदी’ नरेन्द्र शर्मा का महाभारत के प्रसंगो के आधार पर लिखा गया है । ‘द्रौपदी’ में कवि ने नारी की महत्ता प्रतिपादित करते हुए स्पष्ट करना चाहा है कि नारी में सम्पूर्ण ब्रह्मांड समाया है और नारी ही अपने पुण्य कर्म से नर को दिव्य शक्ति तथा प्रेरणा प्रदान करती हुई सृष्टि का संचालन करती है - ’’ नारी नर की शक्ति , शक्ति है जिसकी दुख सहने में ! तप्त स्वर्ण है ताप , अश्रृकण रत्न , जड़े गहने में । जीवन है उद्योग सफलता श्रीफल की भूखी है ; पौरुष है उदीप्ति निहित है नारी के देह में । ‘‘ 6

‘आत्मजयी’ में भारतीय दर्शन के अत्यधिक प्रसिद्ध ग्रंथ ‘कठोपनिषद’ की एक छोटी सी कथा नचिकेता प्रसंग को कवि कुंवर नारायण ने आधार रूप में ग्रहण किया है । ‘आत्मजयी’ जीवन की सृजनात्मक संभावनाओं में आस्था के पुनर्लाभ की कहानी है । नचिकेता के मन में जो प्रश्न उठते हैं, वे जीवन के मौलिक प्रश्न हैं । जीवन मूल्यों की खोज नचिकेता की खोज है । नचिकेता धर्म से प्रवासी है और जन्म से अस्वीकृत । उसका न अतीत है , न भविष्य । वह सरल प्रलोभनों को टालता है और जीने की सार्थकता की खोज करता है । यहीं उसका चरित्र एक नया अर्थ प्राप्त कर लेता है । ’’ मैं जिन परिस्थितियों में जिन्दा हूँ । उन्हें समझना चाहता हूँ ‘‘ 7

उपरोक्त खंडकाव्य के अलावा नरेन्द्र शर्मा का ‘उत्तर जय’, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के ‘उर्वशी’ और ‘रश्मिरथी’, दुष्यन्त कुमार का ‘एक कंठ विषपायी’, भवानीप्रसाद मिश्र का ‘कालजयी’, नरेश मेहता के ‘महाप्रस्थान’ और ‘शबरी’ आदि भी इसी कोटि के काव्य हैं ।

हिन्दी के स्वातंत्र्योत्तर खंडकाव्यों की कथावस्तु में पौराणिक मिथकों को आधार बनाकर उसे नवीन अर्थवत्ता प्रदान करते हुए आधुनिक जीवन की किसी न किसी समस्या का समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। बदलते हुए सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मूल्यों का चित्रण भी इन काव्यों में विद्यमान है । अधिकांश खण्डकाव्यों में रामायण, महाभारत, पुराण या उपनिषदों से कथासूत्र ग्रहण किया गया है । सभी धार्मिक ग्रंथ जीवन को सुंदर बनाने के प्रयास में अग्रसर है । सबका उपदेश मम्मट के शब्दों में ‘रामादिवत वर्तितव्यं न रावणादिवत्’ ही है । स्वातंत्र्योत्तर खण्डकाव्यकारों ने इस सत्य को तीव्रता से अनुभव किया है और पौराणिक आख्यानों में से उन संवेदनात्मक प्रसंगो को चुना है। जो आधुनिक संदर्भो में मानव को कुछ संदेश दे सके और क्षत-विक्षत मानव मूल्यों को पुनर्स्थापित कर सके ।

संदर्भः 1 ‘अंधायुग’ धर्मवीर भारती पृष्ठ, 10, 2 ‘कनुप्रिया’ धर्मवीर भारती पृष्ठ, 58 , 3 ‘भस्मांकुर’ नागार्जुन पृष्ठ, 78 , 4 ‘प्रवाद पर्व’ नरेश मेहता पृष्ठ, 53 , 5 ‘संशय की एक रात’ नरेश मेहता पृष्ठ, 39 ‘द्रौपदी’ नरेन्द्र शर्मा पृष्ठ, 63 , 7 ‘आत्मजयी’ कुंवर नारायण पृष्ठ, 11

--- डॉ. दीप्ति बी.परमार एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी-विभाग आर.आर.पटेल महिला महाविद्यालय, राजकोट

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  1. RAGHUNATH MISRA,ADVOCATE,KOTA5:50 pm

    Swatantryottar hindi khandkavyon mein pauranik mithakon ki navin arthvatta ki prastuti mein deepti parmar ne satik-sarthak vimarsh ka mahaul srijit kiya hai.Sahityakaron ko chintan ki nayee disha darshan ke liye deepti ji ko badhi,sadhuvaad,shubhkamnayen.
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  2. RAGHINATH MISRA,ADVOCATE,KOTA5:58 pm

    Prastuti shrestha,satik,prerak va vinarsh ka rasta kholti dristigochar hoti hai.Badhai.
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  3. अंग्रेजी शब्‍द मिथ का हिन्‍दी रूप मिथक है। मिथ शब्‍द यूनानी मुथॉस से आया जिसका अर्थ है मौखिक कथा। मिथक को भारतीय संदर्भ में आदिम युग के वास्‍तविक विश्‍वासों की अभिव्‍यक्ति माना गया है जो आख्‍यानपरक भी है और प्रतीकवत भी। मिथक अपने समय का एक सामाजिक यथार्थ होता है। आधुनिक कवियो ने इतिहास और पुराणों के अनेक चरित्रों और घटनाओं को अभिप्राय और संदर्भ में प्रयुक्‍त किया है और उनके माध्‍यम से युग जीवन के विघटन, कुंठाओं, विश्रंखलताओं और विस्‍थापनाओं को व्‍यंजित किया है। अतएव कवियों ने इसी शैली को अपनाते हुए पौराणिक कथाओं को युगीन संदर्भों से जोडकर नए मानवीय बोध को प्रस्‍तुत किया है। दीप्ति जी ने इस संदर्भ में स्‍वातंत्रयोत्‍तर हिन्‍दी खंड काव्‍यों में पौराणिक मिथकों की नवीन अर्थवता की गहन गंभीर चर्चा करके अनुसंधानकर्ताओं को एक नयी दिशा दी है।

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  4. वर्तमान समय में सभी कथा साहित्य की ही बात करते हैं। कथा साहित्य के इस महायुद्ध के बीच खण्डकाव्यों को स्मृत करवाने के लिए साधुवाद।

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  5. वर्तमान समय में सभी कथा साहित्य की ही बात करते हैं। कथा साहित्य के इस महायुद्ध के बीच खण्डकाव्यों को स्मृत करवाने के लिए साधुवाद।

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