शनिवार, 12 नवंबर 2011

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बाल कविता - रचनाएँ मन को पुलकित करतीं...

जीवन के सच्चे संघर्षों ने नवगीत लिखा
मैंने तो अब गीत गज़ल को मन का मीत कहा|

विधा व्यंग्य बाणों वाली मन को हर्षाती है
दुनिया देश समाज घरों की व्यथा सुनाती है|

गद्य काव्य में तो जैसे सच का झरना बहता
प्रगतिवाद के नव प्रयोग का पथ मिलता दिखता|

बात उपन्यासों की करना अब बेमानी है
जैसे किसी नदी सूखी में बहता पानी है|    

लोगों को अब लघु कथायें बहुत सुहाती हैं
थोड़े से ही में सब का सच वे कह जाती हैं|

समयाभाव कहां अब पुस्तक पढ़ने देता है
जीवन के अनुभव से सच को गढ़ने देता है|

टुकड़न कतरन पत्र डायरियां सभी छलावा है
बड़े जनों के बड़े चोचले एक दिखावा है|

आज क्षणों में क्षणिकायें सब कुछ कह जातीं हैं
व्यथा व्यवस्थाओं की सबको बतला जातीं हैं|

बाल कहानी कवितायें मन को पुलकित करतीं
दुख तनाव और दर्द सभी का पल भर में हरतीं|

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