गुरुवार, 10 नवंबर 2011

योगेन्‍द्र वर्मा ‘व्‍योम' के गीत

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गीत

चलो करें कुछ कोशिश ऐसी

रिश्‍ते बने रहें

रिश्‍ते जिनसे सीखी हमने

बोली बचपन की

सम्‍बन्‍धों की परिभाषाएँ

भाषा जीवन की

कुछ भी हो, ये अपनेपन के

रस में सने रहें

बंद खिड़कियाँ दरवाज़े सब

कमरों के खोलें

हो न सके जो अपने, आओ

हम उनके हो लें

ध्‍यान रहे ये पुल कोशिश के

ना अधबने रहें

यही सत्‍य है ये जीवन की

असली पूँजी हैं

रिश्‍तों की खुशबुएँ गीत बन

हर पल गूँजी हैं

अपने अपनों से पल-भर भी

ना अनमने रहें

 

गीत

नई ताज़गी भर जाती हैं

पुरखों की यादें

मन को दिया दिलासा, दुख के

बादल जब छाए

ख्‍़ाुशियाँ बाँटी संग, सुखद पल

जब भी घर आए

सपनों में भी बतियाती हैं

पुरखों की यादें

स्‍वार्थपूर्ति का पहन मुखौटा

मिलता हर नाता

अवसादों के अंधड़ में जब

नज़र न कुछ आता

बड़े प्‍यार से समझाती हैं

पुरखों की यादें

कभी तनावों के जंगल में

भटके जब-जब मन

और उलझनें बढ़ती जायें

दूभर हो जीवन

नई राह तब दिखलाती हैं

पुरखों की यादें

 

गीत

अखबारी विज्ञापन बोले

नया साल आया

स्‍वागत की ऐसी तैयारी

क्‍लबों होटलों में

नई पौध का उमड़ा सारा

जोश बोतलों में

फर्राटा भरती सड़कों पर

नशा नया छाया

सिर्फ़ औपचारिकता ही अब

बाक़ी बची यहाँ

‘नया वर्ष शुभ हो' कहने का

वह आनंद कहाँ

नये वर्ष की नई सुबह पर

मन ने समझाया

रमुआ कल भी भूखा सोया

भूखा ही जागा

उठकर सुबह पेट की खातिर

रिक्‍शा ले भागा

आज और कल में उसने कुछ

फ़र्क नहीं पाया

 

गीत

कई दिनों से सोच रहा हूँ

तुमको पत्र लिखूँ

लिखूँ कुशलता घर की, आँगन

की दीवार लिखूँ

खुशफ़हमी की फ़सलें, मन के

खरपतवार लिखूँ

रिश्‍तों के पैबंद लगे जर्जर

से वस्‍त्र लिखूँ

कभी सोचता हूँ कटु अनुभव

बाँटूँ जीवन के

या फिर लिखूँ याद आते दिन

गुज़रे बचपन के

आने वाले उजले पल को

भी सर्वत्र लिखूँ

मोबाइल से बातें तो काफी

हो जाती हैं

लेकिन शब्‍दों की खुशबुएँ

कहाँ मिल पाती हैं

थके-थके से खट्‌टे-मीठे

बीते सत्र लिखूँ

 

गीत

इस बच्‍चे को देखो, यह ही

नवयुग लाएगा

संबंधों में मौन शिखर पर

बंद हुए संवाद

मौलिकता ग़ुम हुई कहीं, अब

हावी हैं अनुवाद

घुप्‍प अंधेरे में आशा की

किरण जगाएगा

घुटन भरा हर पल लगता ज्‍यों

मुड़ा-तुड़ा अखबार

अपनों के अपनेपन में भी

शामिल है व्‍यापार

नई तरह से यह उलझी

गुत्‍थी सुलझाएगा

सोच नई है, दिशा नई है

नया-नया उत्‍साह

खोज रहा है नभ में प्रतिदिन

उजले कल की राह

यह भविष्‍य में एक नया

इतिहास बनाएगा

 

गीत

बारिश के परदे पर पल-पल

दृश्‍य बदलते हैं

गली मुहल्‍लों की सड़कों पर

भरा हुआ पानी

चोक नालियों के संग मिलकर

करता शैतानी

ऐसे में तो वाहन भी

इतराकर चलते हैं

कभी-कभी भ्रम के बादल तो

ऐसे भी छाए

लगता मंगल ग्रह के प्राणी

धरती पर आए

घर से घोंघी पहने तब कुछ

लोग निकलते हैं

कभी फिसलना, कभी संभलना

और कभी गिरना

पर कुछ को अच्‍छा लगता है

बन जाना हिरना

बूँदें छूने को बच्‍चे भी

खूब मचलते हैं

--

- योगेन्‍द्र वर्मा ‘व्‍योम'

AL-49, सचिन स्‍वीट्‌स के पीछे,

दीनदयाल नगर फेज़-प्रथम्,

काँठ रोड, मुरादाबाद (उ0प्र0)

--

(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com  - फतुहा, पटना की कलाकृति)

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