मंगलवार, 29 नवंबर 2011

मीनाक्षी भालेराव के गीत व कविताएँ

image

गीत

शृंगार

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

मैन सोलह किया श्रृंगार

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

 

कजरारे नैनों में काजल लगाया

घुंघराले बालों पे गजरा लगाया

महक उठा था संसार

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

 

कानों में मैंने पहनी थी बाली

नाक में मैंने नथनी सजाई

झूम उठा था संसार

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

 

सौतन के घर थे तुम

या सहेली के घर थे

जिया जलाया सारी रात

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

 

दिल

सवा लाख का दिल था मेरा

खो गया बीच बाजार

सैंया कारण तोरे

 

बीच सड़क पर नैन मिले तो

मैं हो गयी बदनाम

सैंया कारण तोरे

 

लाज से मोरी झुक गयी अँखियाँ

होंट थरथर कांपे

मुझ को सब निहारे

जैसे मैं कोई अजूबा

सैंया कारण तोरे

 

दिल में मेरे हलचल हो गयी

मन मोरा घबराए

बात करूं तो छूटे पसीना

बोल ना मैं कुछ पाऊं

सैंया कारण तोरे

बलमा कारण तोरे

 

प्यासी

ढोला मैं तो प्यासी रह गयी

प्यासी रह गयी रे

तेरे प्रीत की प्यास मनमा

आधी रह गयी रे

 

एक बार तू आकर मिलजा

सीने में बस एक धडकन

बाकी रह गयी रे

 

सांसें मेरी मद्धम हो गयी

अब ना मैं जी पाऊँगी

दिल में एक फाँस अटकी रे

मुझ को तू छोड़ गया

सौतन संग तूने

प्रीत की तूने रीत निभाई रे

ढोला मैं तो प्यासी रह गयी

प्यासी रह गयी रे  

--

कविताएँ

स्वरूप

आकारों में उपस्थित नहीं है

पूरी धरती ईश्वर का रूप है

फिर क्यों हम सब ईश्वर को

मन्दिर,मस्जिद,गुरुद्वारे,चर्चों

में ढूंढते फिरते है ईश्वर को

उस परमात्मा

को जो निराकार है

वो आकर का मोहताज नहीं है

वो भाषा और जाति का भी

मोहताज नहीं है वो तो बस

प्रेम और समर्पण को समझता है

अगर पाना है उस को तो

उसके स्वरूप से नहीं

उस के दिखाए मार्ग पर चलना होगा

इंसानियत और इन्सान से

प्रेम करना होगा

 

जान लेती महंगाई

आंधी और तूफान भला क्या

बिगाड़ पायेगा

भूकंप और बाढ़ भला क्या

प्रलय ला पायेगा

आंतकवाद और गोला बारूद क्या

नर संहार कर पायेगा

इन सब से कहीं-कहीं

नर कंकाल गिरा जायेगें

पर ये जो महंगाई का रावण है

सारी दुनिया में हाकाहार मचाएगा

2 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------