मीनाक्षी भालेराव के गीत व कविताएँ

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गीत

शृंगार

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

मैन सोलह किया श्रृंगार

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

 

कजरारे नैनों में काजल लगाया

घुंघराले बालों पे गजरा लगाया

महक उठा था संसार

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

 

कानों में मैंने पहनी थी बाली

नाक में मैंने नथनी सजाई

झूम उठा था संसार

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

 

सौतन के घर थे तुम

या सहेली के घर थे

जिया जलाया सारी रात

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

बलम तुम कहाँ थे सारी रात

 

दिल

सवा लाख का दिल था मेरा

खो गया बीच बाजार

सैंया कारण तोरे

 

बीच सड़क पर नैन मिले तो

मैं हो गयी बदनाम

सैंया कारण तोरे

 

लाज से मोरी झुक गयी अँखियाँ

होंट थरथर कांपे

मुझ को सब निहारे

जैसे मैं कोई अजूबा

सैंया कारण तोरे

 

दिल में मेरे हलचल हो गयी

मन मोरा घबराए

बात करूं तो छूटे पसीना

बोल ना मैं कुछ पाऊं

सैंया कारण तोरे

बलमा कारण तोरे

 

प्यासी

ढोला मैं तो प्यासी रह गयी

प्यासी रह गयी रे

तेरे प्रीत की प्यास मनमा

आधी रह गयी रे

 

एक बार तू आकर मिलजा

सीने में बस एक धडकन

बाकी रह गयी रे

 

सांसें मेरी मद्धम हो गयी

अब ना मैं जी पाऊँगी

दिल में एक फाँस अटकी रे

मुझ को तू छोड़ गया

सौतन संग तूने

प्रीत की तूने रीत निभाई रे

ढोला मैं तो प्यासी रह गयी

प्यासी रह गयी रे  

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कविताएँ

स्वरूप

आकारों में उपस्थित नहीं है

पूरी धरती ईश्वर का रूप है

फिर क्यों हम सब ईश्वर को

मन्दिर,मस्जिद,गुरुद्वारे,चर्चों

में ढूंढते फिरते है ईश्वर को

उस परमात्मा

को जो निराकार है

वो आकर का मोहताज नहीं है

वो भाषा और जाति का भी

मोहताज नहीं है वो तो बस

प्रेम और समर्पण को समझता है

अगर पाना है उस को तो

उसके स्वरूप से नहीं

उस के दिखाए मार्ग पर चलना होगा

इंसानियत और इन्सान से

प्रेम करना होगा

 

जान लेती महंगाई

आंधी और तूफान भला क्या

बिगाड़ पायेगा

भूकंप और बाढ़ भला क्या

प्रलय ला पायेगा

आंतकवाद और गोला बारूद क्या

नर संहार कर पायेगा

इन सब से कहीं-कहीं

नर कंकाल गिरा जायेगें

पर ये जो महंगाई का रावण है

सारी दुनिया में हाकाहार मचाएगा

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2 टिप्पणियाँ "मीनाक्षी भालेराव के गीत व कविताएँ"

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