शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - गोसेवा

गोसेवा

माधुरी ने सावित्री से कहा “देख रही हो मैं कितना गोसेवा कर रही हूँ। दिन में कम से कम तीन बार तेल लगाती हूँ। पैर भी सहला देती हूँ। घास-भूंसे से अधिक तो अनाज खिला देती हूँ। रोज सुबह-शाम दलिया भी खिलाती हूँ। लेकिन ममता के यहाँ गाय का कैसा अनादर हो रहा है ? अनाज तो दूर ठीक से घास-भूंसा भी नहीं खिलाते। और तो और पानी भी समय से नहीं दिखाते। बस दूध चाहिए। यदि गाय की सेवा न कर सके तो गाय पालना ही नहीं चाहिए”।

सावित्री बोली “ठीक कह रही हो। महात्माजी गो सेवा को बहुत बड़ा पुण्य बता रहे थे। कह रहे थे कि गाय के रोम-रोम में देवताओं का बास होता है। अतः गाय का हमेशा आदर करना चाहिए”।

माधुरी बोली “यह जाकर ममता को बताओ। शायद उसे भी कुछ अक्ल आ जाए।

गाय का कुछ महत्व समझ सके”।

सावित्री ने ममता से कहा “गाय पाली हो तो इसका कुछ ख्याल भी रखा करो। कम से कम चारा-पानी तो समय से दे दिया करो। देख रही हो माधुरी जब देखो तब गोसेवा में ही लगी रहती है”।

ममता बोली “ जब यह दूध दे रही थी तब भी मैंने इसे बांध कर रखा था। और आज भी इसे खुला नहीं छोड़ती हूँ। सड़कों पर देखती हो कितनी गाएँ इधर-उधर घूमती रहती हैं। सड़ा-गला जो मिलता है भूँख के मारे खा जाती हैं। पॉलिथीन तक पेट में चला जाता है। कोई इधर खदेड़ता है तो कोई उधर। लोग मारते-पीटते और दौड़ाते हैं। कभी-कभी मोटर से चोट भी खा जाती हैं। इसी लिए मैं इसे खुला नहीं छोड़ती हूँ। कौन पाप कमाए ? जो हो सकता है घर पर बांध कर खिलाती-पिलाती हूँ।

रही माधुरी की बात तो आजकल उन्हें बहुत गोसेवा भा रही है। उस समय उनकी गो सेवा कहाँ गई थी जब गाय के दूध नहीं था ? खुला छोड़ दिया था। इधर-उधर घूमती रहती थी। एक दिन प्यास के कारण संकरे नाले में गिर गई थी। भला हो उन लोगों का जो समय रहते निकाल लिए थे। नहीं तो उसे गो हत्या लगती। गो हत्या।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।

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