अमिता कौंडल की कविता - दादा का बागीचा

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डॉ. अमिता कौंडल
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तुम्हारे दादा ने लगाया था कभी
हरा भरा बागीचा
पिता ने दे पानी और खाद
की थी इसकी परवरिश
इसकी डालियों पर झूल कर
तुम सब बड़े हुए
इसके फल खा,
छुपन छुपाई खेल
पले तुम्हारे बच्चे
पर घर का बटवारा क्या हुआ
जमीन जायदाद क्या बंटी
तुमने इसे भी बाँट डाला
इसका हर इक पेड़ काट डाला
और बना ली चारों भाईयों ने
बड़ी बड़ी कोठियाँ
अब निशानी के तोर पर
बचा है यह इक आम का पेड़
जिसे रो रो कर बचा लिया था
तुम्हारे बच्चों ने
और आज इसके लिए भी
तुम सब लड़ते हो
इस पर बराबर का हक
समझते हो
तुम सब तो संग न रह सके और
तन्हा कर दिया यह पेड़
जो आज भी तुम्हें
फल,फूल और छाया दे
सीखा रहा है धैर्य, त्याग
और परमार्थ का सबक
अब भी कुछ सीख सकते हो
तो सीखो इससे..................
Amita Kaundal (Ph.D)
 

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4 टिप्पणियाँ "अमिता कौंडल की कविता - दादा का बागीचा"

  1. अमिता जी बहुत भावपूर्ण कविता है । ये पंक्तिया तो बहुत मार्मिक हैं-
    अब निशानी के तोर पर
    बचा है यह इक आम का पेड़
    जिसे रो रो कर बचा लिया था
    तुम्हारे बच्चों ने

    उत्तर देंहटाएं
  2. wah amita ji kya baat hai sahi kaha yadi hum prakriti se kuchh sikh sake to bahut hi achchha hoga sunder kavita
    rachana

    उत्तर देंहटाएं
  3. जो आज भी तुम्हें
    फल,फूल और छाया दे
    सीखा रहा है धैर्य, त्याग
    और परमार्थ का सबक
    अब भी कुछ सीख सकते हो
    तो सीखो इससे.

    बदलते परिवेश का सटीक च्रित्रण...बधाई|

    उत्तर देंहटाएं
  4. अमिता कौंडल10:34 pm

    भाईसाहब, रचना जी व् रीता जी आप सभी के स्नेह शब्दों के लिए हार्दिक धन्यवाद
    सादर,
    अमिता कौंडल

    उत्तर देंहटाएं

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