शनिवार, 5 नवंबर 2011

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की हज़ल (हास्य ग़ज़ल) : लिख देतीं हैं अपने सिर के हाल कंघियों में

लिख देतीं हैं अपने सिर के हाल कंघियों में

खींच खींच कर भर देतीं हैं बाल कंघियों में

धर देतीं हैं सिर का गंदा माल कंघियों में।

बड़े बड़े बालों वाले करते कंघी ऐसी
हर दिन आते रहते हैं भूचाल कंघियों में।

सुबह शाम दोपहर जब भी देखो मिलते अक्सर
बालों के गुच्छों से लथपथ जाल कंघियों मे।

लगता है कंघी ही इनके जीवन की पुस्तक
लिख देतीं हैं अपने सिर के हाल कंघियों।

छोटे छोटे जीव जंतु भी सिर में पल जाते
अक्सर मिलते रहते इनके लाल कंघियों में।

कैसे यह बर्दाश्त करें और कब तक सहन करें
रोज रोज मिलते जी के जंजाल कंघियों में।

हे ईश्वर ऐसा वर दे और ऐसा कुछ कर दे
कभी न आयें बालों के कंकाल कंघियों में।

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