सोमवार, 7 नवंबर 2011

जयप्रकाश मिश्र की कविता - कला और आदमी

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कला और आदमी

मैं

उन लोगों से

निपट कर आया हूं

जो कला को तहजीह नहीं देते।

 

वे हैरान थे

कि एक सूती धोती से

आच्‍छादित हो जाता हो जाता शरीर

तो क्‍यों पहनते हैं लोग

कलात्‍मक परिधान?

 

वे हैरान थे

कि कोई चित्रकार मूर्तिकार

क्‍यों उकेरता कागज पर रंग

या क्‍यों तराशता पत्‍थर से मूर्ति?

 

वे इस लिये भी हैरान थे

कि मैं

किसी सीधी सी बात को

क्‍यों

आड़े तिरछे शब्‍दों में ढालकर

कविता बना देता हूं।

 

मैं नहीं जानता

उनके प्रश्‍नों के उत्‍तर या परिभाषा कला की

किन्‍तु जानता हूं कि हजारों साल पहले

जब नहीं थी कला

आदमी जानवर था।

--

समाप्‍त -

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जयप्रकाश मिश्र

विश्‍ोष- मेरी प्रस्‍तुत कविता दैनिक जागरण 'के 26 जुलाई अंक में छप चुकी है।पाठकेां के तमाम प्रशंशनीय पत्र मिले किन्‍तु बुदि्‌धजीवियों की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।

जयप्रकाश मिश्र

ग्रा-बिजौरी ,डा-गुठिना ,जि-फर्रूखाबाद-205302

mishrajayprakash262@gmail.com

--

(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com  फतुहा, पटना की कलाकृति.)

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