जयप्रकाश मिश्र की कविता - कला और आदमी

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

image

कला और आदमी

मैं

उन लोगों से

निपट कर आया हूं

जो कला को तहजीह नहीं देते।

 

वे हैरान थे

कि एक सूती धोती से

आच्‍छादित हो जाता हो जाता शरीर

तो क्‍यों पहनते हैं लोग

कलात्‍मक परिधान?

 

वे हैरान थे

कि कोई चित्रकार मूर्तिकार

क्‍यों उकेरता कागज पर रंग

या क्‍यों तराशता पत्‍थर से मूर्ति?

 

वे इस लिये भी हैरान थे

कि मैं

किसी सीधी सी बात को

क्‍यों

आड़े तिरछे शब्‍दों में ढालकर

कविता बना देता हूं।

 

मैं नहीं जानता

उनके प्रश्‍नों के उत्‍तर या परिभाषा कला की

किन्‍तु जानता हूं कि हजारों साल पहले

जब नहीं थी कला

आदमी जानवर था।

--

समाप्‍त -

--

जयप्रकाश मिश्र

विश्‍ोष- मेरी प्रस्‍तुत कविता दैनिक जागरण 'के 26 जुलाई अंक में छप चुकी है।पाठकेां के तमाम प्रशंशनीय पत्र मिले किन्‍तु बुदि्‌धजीवियों की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।

जयप्रकाश मिश्र

ग्रा-बिजौरी ,डा-गुठिना ,जि-फर्रूखाबाद-205302

mishrajayprakash262@gmail.com

--

(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com  फतुहा, पटना की कलाकृति.)

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "जयप्रकाश मिश्र की कविता - कला और आदमी"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.