योगेन्‍द्र वर्मा ‘व्‍योम' की लघुकथा - कीटाणु

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कीटाणु

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लगभग 10-11 साल उम्र रही होगी उस लड़के की । पिछले तीन दिन से भूखा था वह। प्‍लेटफार्म पर खड़ी ट्रेन के स्‍लीपर कोच में वह चढ़ा और शर्ट उतारकर उससे फर्श साफ करता हुआ आगे बढ़ता और बर्थ पर बैठे लोगों से इशारे से अपनी भूख को बयानकर कुछ माँग रहा था । कभी कोई उसे रुपया-दो रुपया दे देता या कभी कोई ‘आगे बढ़' कह देता। ट्रेन के उसी स्‍लीपर कोच में एक परिवार भी सफ़र कर रहा था, उस परिवार में एक छोटा बच्‍चा अपने पापा की गोद में बैठा चिप्‍स की थैली में से एक-एक चिप्‍स निकालकर खा रहा था। लड़के ने इशारे से अपनी भूख का इजहार करते हुए उस परिवार से भी कुछ माँगने के लिए हाथ फैलाया। परिवार ने ‘आगे बढ़' कहकर उसे टरका दिया।

तभी अचानक चिप्‍स की थैली बच्‍चे के हाथ से छूटकर नीचे गिर गई और सारे चिप्‍स बिखर गए। बच्‍चा जब उन चिप्‍स को फर्श से उठाने लगा तो उसके पापा ने उसे समझाते हुए कहा - ‘बेटा ! ज़मीन पर गिरी हुई चीज़ उठाकर नहीं खाते, कीटाणु लग जाते हैं और फिर कीटाणु पेट में पहुँचकर बीमारी पैदा करते हैं।' वह लड़का भी वहीं पास वाली बर्थ पर बैठे यात्री से माँग रहा था, अचानक वह पलटा और फर्श पर पड़े चिप्‍स के एक-एक टुकड़े को उठाकर खाने लगा। फर्श पर गिरे चिप्‍स के सारे टुकड़े खाकर वह फिर आगे बढ़ गया, अपनी शर्ट से फर्श साफ करते हुए कुछ माँगने के लिए। बच्‍चा सोच रहा था कि चिप्‍स के टुकड़ों पर लगे कीटाणु क्‍या उस लड़के के पेट में पहुँचकर बीमारी पैदा नहीं करेंगे।

- योगेन्‍द्र वर्मा ‘व्‍योम'

AL-49, सचिन स्‍वीट्‌स के पीछे,

दीनदयाल नगर फेज़-प्रथम्,

काँठ रोड, मुरादाबाद (उ0प्र0)

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(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com  - फतुहा, पटना की कलाकृति)

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2 टिप्पणियाँ "योगेन्‍द्र वर्मा ‘व्‍योम' की लघुकथा - कीटाणु"

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