विजय वर्मा की कविता - नदी और लड़की

नदी और लड़की 

होती है चंचल,

जीना चाहती है 

खुलकर हरपल

होती है सफ़र शुरू

पहाड़ों की ओट से 

माँ की गोद से.

 

खेलती,खिलती छूती है ,

धरा को, धरातल को.

वर्षा-ऋतु ,वय;-काल में 

खिलता है तन,हँसता मन 

गन्दगी जग की,जगह की 

कर देती है क्लांत ,तब

बढ़ती है सिकुड़ती-सिमटती 

शांत-शांत.

 

दूसरे का घर और धरा 

रखने को हरा-भरा 

अपनी अस्तित्व ही भुला दी.

अंत में खो बैठती है 

ना सिर्फ स्वच्छ ,मीठा जल 

नैसर्गिक सौन्दर्य 

बल्कि अपनी आजादी.

 

सागर,भव -सागर में 

विलीन होने से पहले 

था कैसा निर्मल ,स्वछन्द रूप. 

अंत तक हो जाती है 

क्लांत,उदासीन ,विद्रूप .

पर इस समागम के बिना 

क्या नहीं होगा सफ़र---उदेश्यहीन ?

सूख जायेगी मृत-प्राय होगी 

होकर सागर ,सखा विहीन.

 

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v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

1 टिप्पणी "विजय वर्मा की कविता - नदी और लड़की"

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