सोमवार, 7 नवंबर 2011

विजय वर्मा की कविता - नदी और लड़की

नदी और लड़की 

होती है चंचल,

जीना चाहती है 

खुलकर हरपल

होती है सफ़र शुरू

पहाड़ों की ओट से 

माँ की गोद से.

 

खेलती,खिलती छूती है ,

धरा को, धरातल को.

वर्षा-ऋतु ,वय;-काल में 

खिलता है तन,हँसता मन 

गन्दगी जग की,जगह की 

कर देती है क्लांत ,तब

बढ़ती है सिकुड़ती-सिमटती 

शांत-शांत.

 

दूसरे का घर और धरा 

रखने को हरा-भरा 

अपनी अस्तित्व ही भुला दी.

अंत में खो बैठती है 

ना सिर्फ स्वच्छ ,मीठा जल 

नैसर्गिक सौन्दर्य 

बल्कि अपनी आजादी.

 

सागर,भव -सागर में 

विलीन होने से पहले 

था कैसा निर्मल ,स्वछन्द रूप. 

अंत तक हो जाती है 

क्लांत,उदासीन ,विद्रूप .

पर इस समागम के बिना 

क्या नहीं होगा सफ़र---उदेश्यहीन ?

सूख जायेगी मृत-प्राय होगी 

होकर सागर ,सखा विहीन.

 

--

v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

1 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------