सोमवार, 28 नवंबर 2011

रामदीन की हास्य-व्यंग्य कविता - कमीना कुत्ता

‘‘अर्ध-सत्‍य''

कहा कमीना कुत्‍ता'

पिछले दिवस निकट दिल्‍ली के मजमा थे अलबेला।

अलबेली मोटर कारों का हुआ था रेलमपेला।

हाहाकार मचा एकदम से छिन गई जैसे सत्‍ता।

खाली सड़क देखकर उस दिन घुसा वहाँ पर कुत्‍ता।

गरियाकर कुछ मतवालों ने कहा कमीना कुत्‍ता।

 

त्रेता युग में भरत मित्र थे, तभी तो उनको राज मिला।

राम को नफरत थी कुत्‍तों से, बरसों का बनवास मिला।

द्वापर युग में धर्मराज को पड़ी मुसीबत रस्‍ते में।

ज्ञानी, गुरू, बंधुवर, प्रियजन, सभी निपट गये सस्‍ते में।

तभी पुराना साथी आया बनकर तारक रास्‍ता में।

विद फैमली ले गया स्‍वर्ग को, शक्‍ति अजब थी कुत्‍ता में।

 

सतयुग में एक बार इन्‍द्र की गायें हो गयी चोरी,

पता नहीं जब चला चोर का, इन्‍द्र करें बरजोरी।

फेल हुई थी सी0बी0आई0 मची खलबली चारों ओर।

' सरमा नाम की एक कुतिया ने गायें उनकी ला दीं ठौर।

इन्‍द्र कृतज्ञ हुए उस पशु के, दे दी आधी सत्‍ता।

लेकिन अब हम हैं पगलाये, कहें कमीना कुत्‍ता।

 

कलयुग का इंसान खुदा से खुद को बड़ा समझता है।

पर, खुद की जगह '' लाइका को राकेट में प्रथम भेजता है।

कौन साथ राज इन्‍हें दे डाला, क्‍या सौंपी इनको सत्‍ता।

सोचो-सोचो क्‍यों बकते हो, इन्‍हें कमीना कुत्‍ता।

 

बीच सड़क पर हांफे, सोचे, बुरा हाल है जीने का,

घूरे देखें, सभी तो चाहे पीना खून कमीने का।

पकड़ न पाओ जब अपराधी, शरण में इनके जाते हो।

अपनी करनी नहीं देखते इनकी दुम सहलाते हों।

नर की नारी करे प्रधानी, पाथे कंडे औरों के,

फिर विकास कैसे, क्‍यों होगा भैस बंधी है औरों के।

 

सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलयुग ऐसा मित्र नहीं पाओगे।

सोच समझकर अब गरियाना, नहीं तो बहुत ही पछताओगे।

फिर कहते हो बड़ा कमीना, अरे बहुत भला है कुत्‍ता।

अब भी आंखें खोलो प्‍यारे, पास खड़ा है कुत्‍ता।

 

--

' सरमा - एक कुतिया जिसने इन्‍द्र की चोरी हुई गायें खोजी थी।

'' लाइका- अंतरिक्ष में जाने वाली प्रथम कुतिया।

-रामदीन,

जे-431, इन्‍द्रलोक कालोनी

कृष्‍णानगर, लखनऊ-23

मो0 नं0ः 9412530473

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