शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

अरविन्द कुमार की ग़ज़लें

1.

‎"है उसका इम्तेहां ये, खुद को कहो वो अब जला डाले ",
उसी एक चुभते लम्हे ने, थे रिश्ते सब जला डाले.


यहाँ हर दोख्तर-ए-जां पाँव रखने से भी डरती है,
ना जाने कोख से मरने तलक, कोई कब जला डाले.


उन्हें अब मिल के तो देखो, वो हम जैसे ही दिखते हैं,
ज़माने ने हैं उनके नाम से, "साहब" जला डाले.


जिसे कहकर गया था, कल मिलूँगा, मुन्तजिर रहना,
उसी घर ने बड़े बेबस हो, वादे सब जला डाले.


था मेरा ख्वाब, कभी मैं भी तो उस ख़ुर्शीद सा चमकूँ,
इसी चाहत की लौ से, मैंने तेरे शब जला डाले.

2.

सैकड़ों हैं नाम तेरे, मैं पुकारूँ किस तरह,
तू कहीं दिखता नहीं, दामन पसारूं किस तरह.


ख्वाब में आकर के वो, वादा-ए-शब तो कर गया,
कोई मुझको ये बता दे, दिन गुज़ारूँ किस तरह.


एक पत्थर ने बिखेरा, रोशनी को चार सू,
चाँद की ये टूटी किरचें, अब संवारूँ किस तरह.


चेहरे पे कुछ शर्म है, या आईना है दागदार,
साफ़ कुछ दिखता नहीं, खुद को निहारूं किस तरह.


सोचता हूँ सब बता दूं, अश्क, सारे दर्द-ओ-ग़म,
शर्म की केंचल है पहनी, वो उतारूं किस तरह.

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  1. सोचता हूँ सब बता दूं, अश्क, सारे दर्द-ओ-ग़म,
    शर्म की केंचल है पहनी, वो उतारूं किस तरह.

    --वह ! क्या बात है...सुन्दर गज़लें.

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