बुधवार, 9 नवंबर 2011

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - कवि और काले कुबेर!

कवि प्रिया ने पेटोल की कीमतों की वृद्धि के समाचार सुन-देख कर टीवी बन्‍द कर दिया। बिजली बचाओ का नारा दिया और सरकार को हजार लानतें भेजी। मगर महंगाई के असर से हुई परेशानी कम नहीं हो रही थी। कवि ने नये काले कुबेरों और काली लक्ष्‍मी पर कविता लिख कर दुख कम करने का प्रयास किया मगर बात बनी नहीं। कवि कर्म क्षैारकर्म से भी दुप्‍कर हो चला था। काले कुबेरों का धन दिन-दूना रात चौगुना बढ़ रहा था। कई बाबा, साधू, सन्‍यासी, सन्‍त, महात्‍मा श्री श्री आदि इन काले कुबेरों के पीछे पड़े हुए हैं, मगर काले कुबेरों का क्‍या बिगड़ना है। काले नागों की तरह लक्ष्‍मी के उपर बैठकर मुस्‍करा रहे हैं। काले धन की चर्चा से कवि मन दुखी व्‍यथित, हैरान, परेशान तो था, मगर कविता लिखने के सिवाय क्‍या कर सकता था। सरकार ने स्‍पप्‍ट कह दिया त्‍यौहारों के कारण महंगाई बढ़ी है।

एक अन्‍य मन्‍त्री ने भी कहा गरीब लोग पेट भरकर खा रहे है इसलिए महंगाई बढ़ रही है, मगर कवि जानता था कि यह सरकार अपनी बिजली से नहीं किसी बेटरी की बिजली की सप्‍लाई से चल रही है। बेटरी में एसिड खतम होगा तो सरकार के दिमाग का लट्‌टू जलेगा। काले कुबेर वक्‍तव्‍य वीरों और घोपणा वीरों को नौकर रखते हैं। जो उनके लिए वक्‍तव्‍य जारी करते रहते हैं।

इधर सरकार महंगाई से ज्‍यादा सीडी व केसेटों से दुखी है। रोज नई सीडी आती है और सरकार की सांसें उखडने लग जाती है। सरकार आक्‍सीजन लेने दिल्‍ली जाती है और दिल्‍ली की सरकार आक्‍सीजन लेने अमेरीका जाती है। स्‍थानीय ग्रामीण आक्‍सीजन के बजाय कार्बनडाई आक्‍साईड फेफडो में भरने लग गये। सरकार भवरी देवी से चली और भवरी बाई तक पहुंची। नरेगा की मजदूरी से जनता ने मधुशाला का रास्‍ता नापना शुरु कर दिया, एक जन सर्म्‍पक अधिकारी ने मुझे कहा कि देखिये विकास के कारण गांवों में अंग्रेजी शराब की खपत बढ़ गई है। योजना आयोग को इस ओर ध्‍यान देना चाहिये।

वैसे भी योजना आयोग तो बत्‍तीस रुपये रोज कमाने वाले को ही अमीर मानता है। मेरी राय में मोंटेक सिंग आहलूवालिया को एक दिन सुबह बत्‍तीस रुपये लेकर पूरा दिन गुजारना चाहिये। लेकिन ये काले कुबेर इस तरह नहीं सोचते । संसद में सैकड़ों अपराधी घुस गये हैं सब के सब काले कुबेर हैं। काली लक्ष्‍मी की पूजा करते हैं और काले कारनामों से काल कोठरी में जाने को तैयार बैठे हैं।

कवि उदास है। देश उदास है। कविप्रिया निराश है। मगर काले अजगर देश को निगल रहे हैं। कोई इन काले कुबेरों को कैसे समझाए कि कफन में जेब नहीं होती। काले कुबेरो कुछ तो सोचो क्‍या तुमने कफन में भी जेब सिलवा ली है।

आज नही तो कल तुम्‍हारी बेटरी अस्‍त होने वाली है। कुछ तो सोचो यारो क्‍या मेरी आवाज तुम तक पहुंचती है ?

कविवर डा․ बच्‍चन ने ठीक ही कहा है-

नंगा नाचै, चोर बलैया लेय,

भैया,नंगा नाचे।

थोथा मोटी खाल मढे, दमदम दमामे,

कूट रहा है दोनो हाथों मूसल थामे,

नंगा नाचे चोर बलैया लेय,

भैया, नंगा नाचे॥

नंगों का यह नाच कब बन्‍द होगा ?

1 blogger-facebook:

  1. RAGHUNATH MISRA,ASVOCATE,KOTA5:29 pm

    Wah kothari ji.vyangya KAVI AUR KALE KUBER samsamaik-satik hai,maujuda vyavastha-sarkar ke mansubon ka pardafash karne ke liye sadhuvad,badhai.aapne theek hi kaha hai-kavi kya kare shiwaya kavita likhne ke.lekin kavi dasha disha kamkhulasa karke tashveer badal dene ki dam-kham rakhta hai.lab talstay ne aur kya kiya thaa.aap jo kar rahe hain,bas isi se fija badalne ki shuruaat ho sakti hai.main bhi aap ka hasafar hun.
    RAGHUNATH MISRA,ADVOCATE(KAVI,SAHITYAKAR,SAMPADAK,SAMALOCHAK,RANGKARMI)
    3-k-30,TALWANDI,KOTA-324005(RAJASTHAN)
    PH: 07443430201MOB: 09214313946 E-mail:raghunathmisra@ymail.com

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