शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

लोचन बिदेशी की कहानी - अलविदा सनम

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अलविदा सनम

मैंने विमान के झरोंके से देखा। सूर्य क्षितिज में ढल रहा था। एअर मॉरिशस का विमान बड़ी तेजी से पश्चिम की ओर बढ़े जा रहा था। काफी ठंड पड़ने लगी थी। अपने बैग में से स्वेटर निकालने लगा तो पीतल की वह मूर्ति मेरी सीट पर गिर पड़ी। पुलोवर पहनकर इत्मिनान से सीट पर बैठ गया। 'फिर उस काँसे की मूर्ति को गोद में रखकर गौर से देखने लगा तो अतीत और भी एकदम ताजा हो आया। मेनका ने मेरे जन्मदिन पर भेंट करते हुए कहा था ''अमर, यह दो दीवानों की युगल मूर्ति है, पोल और विर्जीनी की। तू ही मेरा पोल है और मैं तुम्हारी विर्जीनी।''

फ्रांसीसी उपन्यासकार बेरनारदें दे सेंपियर की अमर रचना, मोरिशस के ही परिवेश पर लिखा गया उपन्यास 'पोल और विर्जीनी' खुद पढ़ने के बाद तुमने मेनका, मुझे भी पढ़ने के लिए विवश किया था। गजब की प्रेम कहानी है दो दीवानों की। तुमने तो मेनका विर्जीनी ही की तरह प्रेम दीवानी बन जाने की ठान ली थी और बदले में चाहती थी कि मैं भी पोल की तरह तुम को दिलो जान से चाहूँ।

अरे मुई! तुम तो मेरी जुलियट क्लिओपेद्रा अनारकली सब कुछ थी। जान से भी ज्यादा प्यारी थी तुम। इसीलिए तो उस दिन - 'माँ स्वाजी' के समुद्र में तैरते समय चीखने-चिल्लाने लगी तो मैंने जान की बाजी लगाकर तुझे डूबने से बचा लिया था। और उसी शाम के झुटपुटे 'में हवाखोरी करके जब मैं लौटा था तो तुझे पोर्च पर यूँ ही उदास खड़ी देखकर तुम्हारा हालचाल पूछा था। तुमने रुआँसी स्वर में कहा था ''अगर तुम मुझे न बचाते तो यह तन आज एक लाश होता। ''

''यदि तुझे कुछ हो जाता तो मैं। ''

''मुझे इतना चाहते हो! ''

''हो! बेहद प्यार करता हूँ तुम से। ''

सोचता हूँ-यदि उस दिन तुम ने मुझे बढ़ावा न दिया होता तो क्या मैं अपने प्रेम की बात कर पाता। शायद कभी नहीं। और यही अच्छा होता, अन्यथा आज यह नौबत नहीं आती न! अपना वतन न छोड़ना पड़ता न! शुरू-शुरू में जब मैं तुम्हारे घर आया था तो तुम हिकारत भूरी नजर से मुझे देखा करती थी। यदि तुम्हारा वही रूखा व्यवहार बरकरार रहता तो मुझे यह दिन देखना न पड़ता। एक तो मेरा तिरस्कार करती थी; दूजे अपनी किसी भी चीज को मुझे छूने नहीं देती थी क्योंकि पढ़ने का मुझे भी बड़ा शौक था इसीलिए तुम्हारी मेज पर पुस्तकें देखकर मुझ से रहा न जाता था। एक शाम जब तुमने मुझे अपनी पुस्तकों को छूते देख लिया तो तुमने आग्नेय नेत्रों से देखकर मुँह बिचका लिया था। आये दिन मुझे तंग करने के लिए मौका जोहती रहती थी। मगर मेरी छोटी-सी कुरबानी ने तुझे पिघला दिया था और सारी पोल खुल गयी थी कि चोरी-चोरी हम दोनों एक-दूसरे को प्यार करते थे।

मैं तो खुशी से बावला हो गया था उस दिन। रात भी बीत गई तेरे ही ख्यालों में। मुझे बड़ा सहारा मिल गया था यह सोचकर कि इस संसार में है कोई जो मुझे दिलोजान से चाहती है। उसी दिन मुझमें जीने की तमन्ना जागी थी। कुछ कर दिखाने की अभिलाषा ने अंगड़ाई ली थी। मगर देखते-देखते अपनी गंदी हरकत से तुमने मेरी सारे मंसूबों पर पानी फेर दिया।

अब कोसता हूँ उस मनहूस घड़ी को जब मैंने तुम्हारे मकान की दहलीज पर पहली बार पांव रखा था। जाने क्या सोचकर अपने बचपन के यारों को छोड-छाडकर चला आया था अपनी बहन की ससुराल बसने के लिए। आता भी नहीं तो क्या करता। एक तो बचपन से ही माँ का साया सिर से उठ गया था; दूजे विमाता भी सौतेला व्यवहार करने लगी थी। पिता के देहांत के बाद तो कठमाँ ने मेरा जीना और भी हराम कर दिया था। इसीलिए बहन को मेरी दुर्दशा देखी न गई तो मुझे अपने यहाँ बुला ले गई। सोचा था-जीजी और जीजा की सरपरस्ती में सुकून की जिन्दगी जी लूँगा। तुम सब लोगों के अगाध प्यार की छाँव में हँसी - खुशी से जीवन गुजार दूँगा।

मगर ऐसा होते-होते रह गया। मुझे अनाथ जानकर परिवार में सभी को मुझ से हमदर्दी थी। फकत तुम मुझ से चिढी-चिढ़ी रहती थी। सीधे मुँह बात नहीं करती थी। उधर से मेरी पति पीछे मेरी बहन से मुझ से अनजाने में या भूल से हो जाने वाली त्रुटि की शिकायत भी कर देती थी। कभी-कभार मेरी छोटी-मोटी गलतियों के कारण ही बहन और बहनोई में कहा - सुनी हो जाती थी। भरसक मेरी कोशिश यही रहती थी कि मेरे कारण किसी को भी जरा-सा भी क्लेश न पहुँचे। मेरी इसी कमजोरी के कारण तुम्हारे माँ-बाप ने तो खूब फायदा उठाया। मुफ़्त का नौकर जो उन्हें मिल गया था। दो जून की रोटी के बदले में तुम लोगों के खेत-खलिहानों में कोल्हू का बैल बन गया था। बेकस और बेघर आदमी क्या न करता। बस, फालतू समय काटने के इरादे से ही तुम्हारी किताबों को पढ़कर अपना मनोरंजन कर लेता था। मेरा यह शौक भी तुझे रास न आया। एक दिन तुम्हारी एक पुरतक न मिलने पर तुमने तो दर में कुहराम मचा दिया था। वास्तव में, गलती मेरी ही थी। बिना तुम से माँगे ही वह उपन्यास पढ़ने के लिए उठा ले गया था और जब क्षमा-याचना के साथ उस नाविल को लौटाया था तो तुम किस कदर आग-बबूला हुई थी। जो भी अनाप-शनाप मुँह में आया बक डाला था एक साँस में - ''यू प्लर्डा फूल! अनपढ गँवार। मेरी टैक्स्ट बुक को फिल्मी पत्रिका समझ बैठे हो। नासमझ, चुगद! खबरदार, आइन्दा मेरी किसी भी किताब को हाथ लगाया तो कोढी हो जाओगे। ''

तुम्हारी बददुआ और चेतावनी से तो मैं सकपका गया था। पर लगे हाथ मेरे स्वाभिमान को भी ललकार दिया था तुमने। मैं तुम लोगों के खेतों में मजदूरी करता था। इसीलिए तुम मुझे मूर्ख समझ बैठी थी। कई बार मेरा अपमान करने से भी बाज नहीं आई थी। तुम को मालूम नहीं था कि अपने पिता के जीवनकाल में ही मैं एक विषय के कारण एस.सी. पास होते-होते रह गया था। लेकिन बिना स्कूल सर्टिफिकेट के सरकारी नौकरी हासिल करना आकाश कुसुम तोड़ लाने के बराबर था। सो मैं ने मन-ही-मन तय कर लिया था कि एक-न-एक दिन एस.सी. पास करके अपनी काबिलियत और हैसियत दिखा दूँगा तुझे। अत: चोरी-छुपे डटकर इम्तहान की तैयारी में जुट गया था। कभी-कभार संयोगवश आमना-सामना हो भी जाता था तो मुझे मुँह चिडाकर रास्ता काट जाती थी। तुम्हारी ऐसी-वैसी हिमाकत पर रोष भी आता था और हँसी भी आती थी। परीक्षा के दिनों में तो सूत और बहाने का सहारा ले कर परीक्षा-भवन पहुँचता था। सिवाय मेरी बहन के किसी को पता ही नहीं था कि मैंने भी एस.सी. की परीक्षा दी थी। लेकिन नतीजा निकलते ही सारा भाँडा फूट गया। प्राइवेट छात्र होने के नाते मेरा परीक्षा--फल डाक द्वारा घर पर ही भेज दिया गया था। शाम को मैं खेत से थका-माँदा घर लौटा था। तुझे फाटक के आसपास टहलते देखकर मुझे ताजब हुआ था। मुझे शोख निगाह से देखकर मुस्कराई थी। मेरे प्रति तुम में ऐसी कायापलट देखकर मुझे फिर से सोचना पड़ा था कि कहीं तुम्हारी सूरत-शकल में कोई और तो नहीं। लेकिन जब मेरी बहन के साथ-साथ तुमने मुझे बधाई दी तब जान पाया कि माजरा क्या है। मगर यह जानकर खेद हुआ था कि तुम फेल हो गई थी। आये दिन मुझे शर्बती नजर से देखना और मेरे आस-पास मँडराना तुम्हारे हाव-भाव तुम्हारी सभी अदाएँ मुझे यही पैगाम देने लगी थीं कि मैं तुझे भाने लगा था। मैं भी खामोशी से तुझे दिल में बसाने लगा था।

और उस दिन समुद्र में हादसे के बाद गोधूली में प्रेम के आवेश में जिस शिद्दत से तुम मुझ से लिपट गई थी जाहिर था कि तुम्हारे उस मिलन में लेश मात्र भी बनावट नहीं थी। फिर उस रात को भी तुम्हारी बहाने बाजी में मुझे से मिलने की तड़प की झलक ही थी। तुम्हारी याद में खोया-खोया में बरामदे में आरामकुरसी पर बैठा 'देवदास' उपन्यास पढ़ रहा था तो तुम दबे पाँव आकर मेरे सामने खड़ी हो गई थी छुई-मुई सी। तुम्हारे हाथ में कापी और पुस्तक को देखकर तो कुछ-कुछ समझ में आया था कि तुम भी शायद पढ़ रही होगी मगर आधी रात को इस तरह चोरी-चोरी आ जाना और वह भी नाइटी में मुझे अच्छा नहीं लगा था। दिन में यदि कोई मेरे इतने करीब तुम को देख लेता तो साधारण बात होती। लेकिन लगभग मध्य रात्रि में जबकि सब लोग सो रहे थे, हम दोनों को आस-पास देखकर बेशक किसी को भी बेसिर पैर की गलतफहमी हो सकती थी। इसीलिए तो मेरा दिल धड़कने लगा था। मैं चौकन्ना हो गया था। मगर तुम तो बिना भय के अपने आप में सिमटी मुझे कनखी से ताके जा रही थी, मुरकराये जा रही थी। उस वक्त हम दोनों में फुसफुसाते जो गुफ़्तगू हुई थी, वह अभी तक मुझे स्मरण है। जब मैं मौन धारण किये हुए तुम को निहारे जा रहा था तो तुम ने एकाएक कहा था, 'मैं जाती हूँ। ''

''बिना कुछ कहे! फिर आई थी क्यों? ''

''एक काम था। ''

''बताओ तो सही। ''

''गणित का एक सवाल है। उसको हल कर दीजिए प्लीज। '' तुम ने दुलार से गुजारिश की थी।

न चाहकर भी मैंने तेरी कापी में सवाल को विस्तारपूर्वक हल करके तुझे समझा दिया था। कितनी आसानी से उस प्रश्न को हल करते हुए मुझे देखकर तुम खिल उठी थी। अनायास मेरे कंधे पर तुमने अपना हाथ रख दिया था शायद मुझे शाबासी देने के लिए लेकिन मुझे तो लगा था जैसे मेरे उपर बिजली गिर पड़ी थी। चाहा तुझे अपने आगोश में करा लूँ। मगर किसी आफत की आशंका से अपने-आप को काबू में कर लिया था। तुझे फौरन चले जाने के लिए विवश किया था। तुम अनमनी-सी होकर चली गई थी, वैसे तो मैं मन-ही-मन चाहता था कि तुम मेरे सामने मेरे पास आजीवन खड़ी रहो, बैठी रहो, और मैं तुम्हारा दीदार करता रहूँ। कुछ मिनट पहले जब तुम स्टडी रूम से मेरे सामने आई थी तो मैं तुम्हारी ही याद में डूबा हुआ था।

उस रोज सुबह से लेकर शाम तक खेतों में तंबाकू की फसल के पीछे इतना व्यस्त रहा था कि तुम्हारी एक झलक भी नसीब नहीं हुई थी। तुझे एक पल देखने के लिए तरसता रह गया था। शायद तुझे भी अवकाश नहीं मिला होगा ट्युशन के पीछे। फिर होमवर्क में व्यस्त हो गई होगी। मुझे तो थकान के बावजूद भी नींद नहीं आ रही थी तो शारलोत ब्राँते का उपन्यास 'जेन एअर' पढते-पढते तुम्हारी ही याद में जो गया था। शायद वह टेलीपैथी का ही कमाल था जिसने तुम को भी मुझ से मिलने के लिए बेकरार कर दिया होगा। मेनका, तुझे देख कर कितना सुकून मिला था मुझे उस रात। मैंने अपने मुकद्दर को सराहा था-मैं कितना भाग्यशाली हूँ कि मन माफिक लड़की से प्रेम हो गया था। तेरे मात्र स्पर्श से मेरी सारी थकान छू-मंतर हो गई थी और आँख लगते ही तुम्हारा ही सपना देखते-देखते भिनसार हो गया था।

आये दिन मेरे इर्द-गिर्द इस कदर चक्कर लगाने लगी थी, गोया मुझे देखे बिना तेरा जीना दुश्वार हो जायेगा। मुझ से तन्हाई में मिलने के लिए तेरी तड़प और अकुलाहट को मैं अनुभव करता था। एकाध बार एकान्त में मिलने का मौका भी मिल जाता था तो हम परिवार की निगरानी के कारण एक शब्द भी नहीं बोल पाते थे। मेरी मुहब्बत में तुम इस कदर अंधी हो गई थी कि यदि मैं साथ भाग चलने के लिए जरा भी इशारा करता तो बेशक तुम राजी हो जाती। मगर तुझे भगाकर ले भी जाता कहाँ? मेरा न अपना कोई ठौर-ठिकाना था, न कोई रिश्तेदार जहाँ तुझे सिर छुपाने के लिए छत मिल जाती। तुम मेरी बेकसी को भाँपकर ही सूनी-सूनी आँखों से एकटक देख लिया करती थी मुझे। मैं भी ऐसी-वैसी असामाजिक हरकत से तुम्हारे माँ-बाप को खफा नहीं करना चाहता था। एक तो उन्हीं का दिया खा रहा था; दूजे वे मुझे अपना बेटा जैसा मान रहे थे। ऐसी सुविधाओं को पाकर मैं शीघ्र अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता था, मगर तुम पर तो 'जरूरत से ज्यादा ही प्रेम-मुहब्बत का भूत सवार था।

मैं भी तो उसी गरमजोशी से तुझे चाहता था। अपने प्यार को एक अन्जाम देना चाहता था। इसीलिए समय का तकाजा था। पहले मैं तुम्हारे माँ-बाप का विश्वास जीतना चाहता था। उनके खेत-खलिहानों को अपना ही जर-खरीद-सा समझकर उसमें जी तोड़ मेहनत करता था। तुम्हारे बरताव से तो यही प्रतीत होता था कि सारा दिन घास-मिट्टी में मेरा इस तरह खटना तुझे खलता था। मैं भी क्या खुश था कि सारा दिन घास-पानी में, मिट्टी में मिलता रहता था लेकिन कोई और चारा भी तो नहीं था। वैसे पेट के लिए कोई काम बुरा नहीं है। मैं भी सरकारी या अर्ध-सरकारी नौकरी के लिए दरखास्त-दर-दरखास्त देता रहता था, मगर हालात ऐसी थी कि बिना किसी नामी-गिरामी आदमी की सिफारिश के कुछ बन नहीं रहा था। फिर भी, कहीं भी मुलाजिम बनने की लालसा में अपने प्रभाव को बरकरार रखा हुआ था, क्योंकि कहीं पर मैंने पढ़ा था- ''खुद ही को कर बुलंद इतना, कि हर तदबीर से पहले, रबुदा बन्दे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है। ''

मेनका, उधर तुम भी तो पढ़ाई में लीन थी। इसलिए प्यार-मुहबत को तुम्हारी शिक्षा में आड़े नहीं आने देता था। मगर तुम तो प्रेम को ही पढ़ने-लिखने का प्रेरणा-स्त्रोत समझती थी। तुमने कहा था ''इश्क कुरबानी माँगता है। '' और तुम ने रोमियो-जुलियट, लैला-मजनू, हरि-राँझा आदि की प्रेम कहानियाँ गिना दी थीं। मैंने भी क्या कम कुरबानी दी थी। तुम्हारे प्यार और खुशी के खातिर ही मैंने उस छात्रवृत्ति को ठुकरा दिया था। दक्षिण अक्रीका के विश्वविद्यालय में एलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग करने का वजीफा मिला था। दो साल की जुदाई की कल्पना मात्र से ही तुम रोने-धोने लगी थी। मेरे वियोग में मर जाने की धमकी देने लगी थी मुझे। तुम से बिछुड़ना मुझे भी तो मुहाल हो रहा था। आखिरकार तुम्हारी खुशी की बेदी पर मैंने उस स्कोलरशिप का बलिदान कर दिया था। फिर तो तुम मुझे अपने इशारे पर नचाने लगी थी।

हर शाम डिनर के बाद मैं दोस्तों के साथ बाहर टहलने जाता था। दोस्तों के साथ चहलकदमी करना, गप्पें हाँकना मेरा शौक बन गया था। मगर ये भी तुझे गवारा नहीं हुआ। मेरी इस आजादी पर भी पाबंदी लगाने हेतु तुम ने एक अच्छी तरकीब निकाल ली थी। बाद में जब तुमने अपनी योजना की पोल खोली थी तो मैं तुम्हारी बुद्धिमता पर मुँह बायें रह गया था। अपने माँ-बाप को तुमने फुसलाकर उनसे एक टी वी सेट खरीदवा लिया, इस मकसद -से कि मैं दोस्तों के साथ हवा-खोरी करना छोड़कर टी वी कार्यक्रमों को देखने के बहाने तुम्हारे आसपास बैठा रहूँ और तुझे निहारा करूँ। एक हद तक तुम तो अपने इस इरादे में कामयाब भी हो गई क्योंकि टी वी प्रोग्रामों को देखने के लालचवश मुझे लाचार होकर अपनी हर शाम तुम्हारे नाम कर देनी पड़ी थी। फिर तुम ने आँख-मिचौली का नाटक शुरू कर दिया। तुम बेहिचक मेरे अगल-बगल बैठ जाती थी या मैं निस्संकोच तुम से परिवार की मौजूदगी में ही मजाक भी कर देता था। जब फिल्मों में यदा-कदा लव सीन होता था तो तुम्हारी शरारती आँखें मुझे छेड़ देती थीं। अब मैं सोचता हूँ कि तुमने मुझे भी टी वी के मनोरंजक कार्यक्रमों के ही माफिक अपने दिल-बहलाव का साधन ही समझ लिया था। रेडियो पर भी तुम्हारी ही फरमाइश पर प्यार-मुहब्बत के गीत सुना करता था। इस प्रकार तुम अपने प्रगाढ़ प्रेम को जाहिर करती थी तो फिर किस पागल कुत्ते ने तुझे काट दिया था जो तुम ने मेरे साथ ऐसा घोर विश्वासघात किया। एकाएक मेरे खिलाफ तुममें जमीन-आसमान का फर्क कैसे आ गया। तुम जो कहते थकती नहीं थी कि तू मेरी दीवानी विर्जीनी है, साथ जीयेंगे, साथ मरेंगे पोल और विर्जीनी की तरह। मक्कार! बेवफा! बड़ी प्रेम-दीवानी बनने चली थी, विर्जीनी की तरह। मगर तुम तो उसकी गोडधोवन भी नहीं। मुझे गुमराह करके छोड़ दिया तुम ने बदजात! मेरी मति मारी गई थी जो तुम्हारी हर बात को वेद-वाक्य मानकर यकीन कर लेता था। करता भी नहीं कैसे! तुम जैसी बहुरूपी के पेट की बात जानना क्या आसान था! तुम्हारे मासूम चेहरे के पीछे-पीछे मैं भोला-भाला दुम हिलाता फिरता रहा था, क्योंकि तुम्हारे मन-वचन-कर्म से तो अविश्वास करने का सवाल ही पैदा नहीं होता था।

कैसे भूल गई इतनी जल्दी उस दिन की घटना। 'हाय-हाय' करने लगी थी मेरी चोट देखकर। मैंने चैला फाडते समय अपने ही पैरों में कुल्हाडी मार ली थी। अपना कोई सगा ही इतना दु:खी हो सकता था। सब के सामने ही तुम ने मेरे जख्म पर मरहम-पट्टी की थी। मुझे तुम्हारी सहानुभूति दया और दिलेरी पर नाज हो आया था। कई दिनों तक मैं बिस्तर पर पड़ा रहा था तो तुम ने ही मेरी बहन से भी ज्यादा मेरी सेवा की थी। घर वालों की अनुपस्थिति में कई बार एक सीमा तक हम खुलकर मिले थे एक-दूसरे की बाहों में। यदि मैं ने उस मौके से फायदा उठाया होता तो आज मुझे ठुकरा कर तुम इतनी आसानी से किसी और की नहीं बन सकती थी। लेकिन मेरा संस्कार इतना घटिया नहीं जो शादी से पहले ही बिना रश्मो-रिवाज के मैं अपनी भावी मंगेतर के साथ यौन संबंध कर लेता। मुझे गर्व है कि तुम जैसी हरजाई से नेह लगाकर भी मैं तन और मन से पाक हूँ।

हवाई जहाज की परिचारिका खाना परोसने आई तो मेरा ध्यान भग्न हुआ। मैं जल्दी-जल्दी पोल और विर्जीनी की युगल मूर्ति को मचान पर पड़े बैग में रखने के लिए उठा तो उस महिला ने मूर्ति को ललचाई हुई आँखों से पलभर देखकर कहा, ''वेरी ब्यूटीफुल ओइडल! ''

''पोल और विर्जीनी की है। ''

''प्रेमिका का तोहफा होगा।

'इतना खुशनसीब मैं कहाँ। यदि आपका कोई प्रेमी हो तो उसे दे दीजियेगा। '' मैं उसकी हथेली पर मूर्ति को थमाते बोला था।

'थैंक्यु! सी यू अगेन। '' वह खुशी से बावली हो गई थी। मुझे हृदय से धन्यवाद देकर मुस्कराते हुए चली गई थी।

भोजन काफी खुशबूदार था, मगर मुझ से खाया नहीं गया। जूस पीकर मैं लेटने की कोशिश करने लगा था।

झपकी आने लगी तो वायुयान हिचकोले लेने लगा। फौरन यानवाहक की ओर से सूचना मिली मौसमी खराबी के कारण ऐसा हुआ था। वैसे यात्री इससे बेखबर जाने-पीने, गप-शप करने में मग्न थे। कुछेक यात्री टोयलेट जाने के लिए आवा-जाही कर रहे थे। मेरी बगल में मेरे दो - हमसफर पत्रिकाएँ पढ़ने में मग्न थे। वही होस्टेस मुझे भी जागा देखकर एक-दो फिल्मी पत्रिकाएँ दे गई। कितनी हँसमुख और हसीन थी वह। मेनका तुम तो इतनी खूबसूरत नहीं थी फिर भी मैं तुम पर फिदा था। चाहता तो तुम्हारी तरह मैं भी तुझे धोखा दे सकता था। मुझे भी गोरी-चिट्टी युवतियों की कमी नहीं थी। कई हुस्न वाली मुझ पर भी जान देती थीं। तुम्हारे सिवा मैंने किसी को भी दिल में नहीं बसाया, लेकिन तुम तो आस्तीन की साँप निकली। मौका मिलते ही धोखा दे गई मुझे। दगाबाज! आखिर क्यों? क्यों तुम ने ऐसा घिनौना खेल खेला मेरे साथ। काश! मैं अन्तरयामी होता तो तुम जैसी कठकलेजी के पास फटकता भी नहीं। और आज मैं भी कम-से-कम एक सरकारी हाकिम होता। शायद तुम्हारे नये यार से भी बढ़कर ग्रेजुएट होता, अच्छा पेशा होता। मोटी तनखा मिलती। एक सुशिक्षिता रूपवती मन माफिक बीवी होती। मगर तुम तो मेरे दिलोदिमाग पर इस कदर हावी हो गई थी कि मेरे विवेक को लकवा मार गया था।

पहली बार गेट पर मोटर से तुझे उतरते देखकर तो मुझे वहम तक नहीं हुआ था। लेकिन जब दों-तीन दिन सिलसिलेवार उसी मोटर वाले को तुझे कॉलेज से घर पर पहुँचाते देखा तो पूरा शक पैदा हो गया था। मुझे इस नतीजे पर पहुँचते देर न लगी थी कि तुम दोनों में कोई चक्कर चलना शुरू हो गया है। मैं ईर्ष्या से जलने लगा। तुम भी मुझ से कन्नी काटने लगी थी। तुम्हारा शुष्क व्यवहार मेरा जीना हराम करने लगा। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि आख्रिर मुझ से कौन-सी ऐसी खता हो गई जिससे तुम नाराज हो गई हो। बात तब समझ में आई जब संयोगवश मैंने तुम्हारी माँ को पड़ोसन से बातचीत करते सुना था ''मेनका बड़ी भाग्यवान है। एक अच्छे खानदान और पैसेवाला लड़का उसका हाथ माँग रहा है। मेनका उसी के कॉलेज में पढ़ती है। '' इस अफवाह पर जब मैंने तुम्हारी राय जानना चाहा तो किस बेशर्मी से जवाब दिया था, ''जब एक टीचर मुझे चाहता है और मेरे माँ-बाप को मंजूर है तो भला मैं कैसे इनकार कर सकती हूँ। '' सुनकर लगा था, गोया तुमने मुझ पर तेजाब फेंक दिया हो। पाँव के नीचे से जमीन सरक गई थी। आसमान टूट पड़ा था मुझ पर। जी चाहा तुझे वहीं दफना दूँ। किसी और को पति रूप में स्वीकार करने पर मेरे मन में आया तेरा सिर फोड़ दूँ जैसे देवदास ने पार्वती के माथे पर दाग दे दिया था, अपने निश्छल प्रेम को उसे आजीवन रमरण दिलाने के लिए। उस सनक में मैं कुछ भी कर सकता था, मगर विष का घूँट पीकर रह गया था मैं। इसके बावजूद मैंने अपने मनमुटाव की भनक किसी पर भी पड़ने नहीं दी थी। बस मैंने अपनी मृत मुहब्बत की लाश पर दो कतरे आँसू बहाकर कफन ओढाकर मौन साध लिया था। मेरी सहनशीलता की हद हो गई थी। दिल पर पत्थर रखकर बरदाश्त कर ली थी तुम्हारी बेवफाई को। अब तो दिल से यही आहें निकलती हैं कि मेरे दुश्मन! तू जीवन पर्यन्त मेरी दोस्ती को तरसती रहो। यों तो मैं भी तुझे भूला नहीं पाऊँगा। बेवफाई की चोट नासूर बनकर रिसती रहेगी टीसती रहेगी। पता नहीं, तुझे बीते हुए लहमों की कसम याद होगी भी या नहीं, ईश्वर जाने! मगर इतना तय है कि बहरहाल तुझे मेरी याद नहीं आयेगी क्योंकि तुझे एक नया प्रेमी जो मिल गया है। मेरी बहन भी मन-ही-मन यही चाहती थी कि परिवार में ही मेरे साथ तुम्हारा गोलावट शादी हो जाये मगर ऊपर वाले को कुछ और ही मंजूर था। तुम्हारे माँ-बाप के घर को शांति-निकेतन समझ बैठा था, मगर वह घर तो अब काटने को दौड़ता है। थोड़ी-सी पुश्तैनी जमीन थी। उसी को बेचकर जा रहा हूँ इंग्लैंड के एक अस्पताल में नर्स की नौकरी करने। तुम तो कल हाथों में मेंहदी लगाकर सोलहों मृंगार करके किसी और मनभावन का संसार बसाने चली जाओगी। कसमें खाई 'थी मेरा साथ निभाने की लेकिन मुझे तन्हा छोड़कर चली जाओगी किसी और के साथ। फिर भी तुझे मुबारकबाद ही देता हूँ। मेरी यही दुआ है कि तुम खुश रहो, आबाद रहो। तुझे दुनिया की सारी खुशियाँ नसीब हो सनम! अलबिदा!

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कहानी संग्रह तीसरा प्राणी - मॉरिशस से हिन्दी कहानियाँ  - लोचन बिदेशी - नटराज प्रकाशन नई दिल्ली से साभार.

2 blogger-facebook:

  1. बेनामी5:05 pm

    चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की 'उसने कहा था’ कहानी कि आवस्यकता है अगर किसी के पास हो तो भेजे r_radhasharma2001@yahoo.com

    उत्तर देंहटाएं
  2. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी "उसने कहा था" इंटरनेट पर कई जालस्थलों पर मौजूद है. साधारण सर्च से इसे देखा जा सकता है. आपकी सुविधा के लिए यह लिंक है -

    http://www.brandbihar.com/hindi/literature/vividh_kahani/chandradhar_sharma_usne_kaha_tha.html

    अथवा
    http://gadyakosh.org/gk/index.php?title=%E0%A4%89%E0%A4%B8%E0%A4%A8%E0%A5%87_%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE_%E0%A4%A5%E0%A4%BE_/_%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A7%E0%A4%B0_%E0%A4%B6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE_'%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A5%80'

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