शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

अशोक शर्मा आशु की कविता - माँ

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माँ

तुम नहीं हो बताओ तो अब कौन से घर जाऊं मैं!!

मन करता है बस जिंदा रह कर भी मर जाऊं मैं!!

 

तुम्हारे चले जाने के बाद सब सूना सा लगता है,

बात करने को नहीं है , मन है चुप कर जाऊं मैं!!

 

सबसे बातें मुलाकातें, बस बेगानी सी लगती है,

तुमे मिलने का मन हो,  तो कहो कौन घर जाऊं मैं!!

 

कभी कभी तो हर चेहरा माँ तेरे जैसा लगता हैं ,

अब तुम जैसी ढूंढने को कहाँ और किधर जाऊं मैं!!

 

क्यों इतनी तुम अनजान,  और निर्मोही हो गई माँ,

तेरी यादों का पावन दिया कैसे बुझा कर जाऊं मैं!!

 

अब तो बस एक ही मेरी, इच्छा है पूरी कर देना,

अगले जन्म मैं भी तेरा ही बेटा आ कर बन जाऊं मैं!

--

 

आशु (Ashok Sharma)

About Me

I think I am simple, emotional and sensitive person..in other words may be not a practical person who deals with their emotions in a controlled manner. At times I feel somewhat incomplete as I have a lot to say what words fails me to express what I want to say. This urge to say sometimes results in what I write..need I say more..

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