सोमवार, 7 नवंबर 2011

विश्व मोहन माथुर की प्रेम कविताएँ

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रंगों का अभिसार


हर मुग्धा के कान में कहने लगा समीर,
क्यूं सकुचाए हाथ में लेकर रंग अबीर।
हवा चली पिचकारियां लेकर अपने साथ,
मौसम चूनर को लिए हुआ अचानक साथ।

रीते-रीते नयन का भरा- भरा आकाश,
चढ़ते यौवन में हुआ अजब विरोधाभास।
अंग-अंग मलने लगी केशर आज बयार,
वातायनं से हो रही रंगों की बौछार।

जितने मन राधा हुये उतने मन घनश्याम,
रंग में डूबे विश्व के बदले जब आयाम।
पोर-पोर में बस गया रंगों का संसार,
यौवन रंग की नाव पर जब हो गया सवार।

छलकी गगरी रूप की भींज गया सब गात,
रंग भरे तालाब में लगे खिला जलजात।
बार-बार आये सजन साधों का त्यौहार,
इसी बहाने से हो प्रिय रंगों का अभिसार।

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तुम्हारी आँख का काजल



तुम्हारी आंख का काजल चुरा कर छा गये बादल।
नारी कल्पनाएं कर रहा है मन मेरा पागल।।
घटाओं में छुपाकर मुंह -
सितारे सो गये हैं।
उनींदी रात के सपने
पराये हो गये हैं।
ये रिमझिम की ध्वनि है या किसी की बज रही पागल।
तुम्हारी आंख का काजल चुरा कर छा गये बादल।।


प्रति का दीपक प्रणय की
देहरी पर जल रहा है।
हर छंद मेरे गीत का -.
अनुबंध .जीवन लग रहा है।.
इन गिरती बिजलियों से हो रहा मन और भी घायल।
तुम्हारी आंख का काजल चुरा कर छा गये बादल।।


तरु की सुहागन फुनगियों पर -
इठला रहे हैं पात भी।
इन्द्र धनुषी चुनरी में -
शरमा रही है रात भी.
हो रही क्यों आज तेरी लाज से ही लाज कायल।
तुम्हारी आंख का काजल चुरा कर छा गये बादल।।

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ये गुलाबी धूप


ये गुलाबी धूप
कार्तिक की
भर गई है
देह में सिहरन
होंठ पर हंसने लगे हैं
मालती के पूल ...
ये कुमुदनी उम्र की
सीमा गई है भूल ....
ये किताबी गंध
चाहत बनी हुयी है
आंख का अजन ...
तुम छुओ तो
ये हवाएं बज उठे
तुम सजो तो
संब दिशाएं सज उठे
ये बहारें भी विरासत की
लग रही हैं सांस का
मधुवन।

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शरमाई सांझ


तुमने क्या कह दिया
मौसम के कानों में
मुसकाई सांझ
तपता रहा दिन यों ही
कंगन के रूप सा,
हर तरफ फैला है
सन्नाटा धूप सा,
तुमने क्या कह दिया
सूरज के कानों में
शरमाई सांझ।
पिघल रहे
बर्फ के पहाड़
बिन वर्षा के
आ गयी है बाढ़
तुम ने क्या कह दिया
सरिता के कानों में
अलसाई सांझ।

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(कविता संग्रह - एक दिन केवल प्रेम करें से साभार)

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