शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

विश्वजीत 'सपन' की कविता - हक़ीक़त

हक़ीक़त

मैं,

चाहता हूँ कहना,

एक हक़ीक़त,

पर,

कह न पाता हूँ।

जिन्‍दगी एक उलझन है,

सुलझ गई, मोती है,

न सुलझी खोटी है।

 

चाँद को बेदाग कर पाया कौन?

शीतलता उसकी मिटा पाया कौन?

चाँदनी आती है, जाती है,

बदली छँटती है, घिरती है,

सुबह होती है, शाम होती है,

जिन्‍दगी कभी हँसती है तो कभी रोती है,

लोग हँसते हैं और रोते हैं,

लोग जीते हैं और मरते हैं,

कोई सुखी है तो कोई दुःखी?

देखता सब,

जीवन नश्‍वर है,

जानता सब,

सुख भ्रम है,

मिलता किसे ?

दुःख भ्रम है,

डसता किसे ?

सत्‍य है !

किन्‍तु,

विश्‍वास कर पाया कौन?

इस मायाजाल को समझ पाया कौन?

कहा न !

जिन्‍दगी एक उलझन है,

सुलझ गई मोती है,

न सुलझी खोटी है।

 

कितने ही पहलू हैं जीवन के,

देखता कौन?

हर क्षण बदलती करवट ये,

समझता कौन?

न समझो तो हँसती है ये,

हँसी इसकी समझ पाया कौन ?

हँसना आसान है, हँसाना नहीं,

ज़िन्‍दगी वीरान है, सजाना कहीं,

यही तो उलझन है,

गर चाहा तुमने न मिलेगा तुझे,

गर न चाहा तुमने न मिलेगा तुझे,

मिलेगा उसे,

जो है हक़दार इसका,

दुनियाँ कहती है,

तुम न मानो तो क्‍या है ?

कहा न !

ज़िन्‍दगी एक उलझन है,

सुलझ गई मोती है,

न सुलझी खोटी है।

 

विश्‍वजीत सपन'

1 blogger-facebook:

  1. बहुत कलात्मक एवं विचारात्मक कविता- " हकीकत " . बधाई.


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