शनिवार, 12 नवंबर 2011

दामोदर लाल 'जांगिड' की ग़ज़ल

 

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ग़़ज़ल

छोटा सा कटोरा था उसका, दो मुठ्ठी ले भर आया है।

पर देख के मेरी झोली को, सर दाता का चकराया है॥

 

उन चाँद सितारों को पा कर ,इतराये वो भरमाये वो ,

रस्‍ते का रोड़ा मान जिन्‍हें,बहुधा हमने ठुकराया है।

 

दिल अंकबूत हैं सपनों, ताना बाना बनता रहता,

किस पर दोष मढ़ें जिसने,इसमें हमको फंसवाया है।

 

चीखी थी हदें तानाजन कि, हद होती हैं लाचारी की,

कूव्‍वत होती हैं जिसमें वो,इक हद तक ही रुक पाया है।

 

जब जब भी खुदा से रुठा मैं,हर बार मनाने आया वो,

रुठा हैं खुदा उसका उससे,कर अरदासें उकताया है।

 

मत भाग भरोसे बैठ कभी,कुछ कर के ही कुछ पायेगा,

हाथों की लकीरें देख,नजूमी ने अक्‍सर समझाया है।

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(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com , फतुहा पटना की कलाकृति)

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