शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

अलका सैनी की कविता - मैं तो राधा बन गई, पर तुम न बन पाए श्याम...

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मैं तो राधा बन गई

पर तुम बन ना पाए श्याम


महफ़िल में होता रहा कौरवों के हाथों चीरहरण

तब किस वृक्ष, किस आश्रय की लेती शरण ?

तुम  मूक आँखों से देखते रहे मेरा मरण

मैं तो राधा बन गई

पर तुम बन ना पाए श्याम


वक्त के चलते जो जिल्लत सही

जिसकी कहानी कई बार तुमको कही

सुनकर हृदय तुम्हारा भीगता रहा

फिर दिए घाव आज तुमने भी वही


मैं मीरा बन भटकती रही डगर- डगर

राणा के हाथों पीती रही विष का कहर

नस- नस में लहू दौड़ने लगा बनके जहर

मैं तो राधा बन गई 

पर तुम बन ना पाए श्याम


तुम रुक्मणी के संसार में रमते रहे

मुझे होनी के हाथों  रुसवा करवाते रहे

नीर से भीगा मेरा संदेशा जल कर भस्म  हो गया

मैं तो राधा बन गई

पर तुम बन ना पाए श्याम


मेरा तकिया रात के तूफानों में भीगता रहा

बादलों का दिल भी  मेरे साथ पसीजता रहा

पर तुम गोवर्धन पर्वत लेकर ना आए

मैं तो राधा बन गई

पर  तुम बन ना पाए श्याम

--

(अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com  फतुहा, पटना की कलाकृति)

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