शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

एस के पाण्डेय की लघुकथा - चरित्र

चरित्र

“चेहरे पर इतनी उदासी क्यों है । लगता है कोई बहुत ही गम्भीर मामला है” । राजीव ने माधव से कहा ।

माधव बोला “हाँ प्रिया के बारे में सोच रहा हूँ । जितने ही नैतिक मूल्यों की बात किया करती थी । वह उतनी ही अनैतिक निकली । उसकी एक-एक बात कानों में गूँजती रहती है-चरित्र बहुमूल्य धरोहर है । जिसने अपना चरित्र खो दिया । उसे जीवन में कुछ खोने के लिए शेष नहीं बचता । हमारे पूरे खानदान में चरित्र को सर्वोपरि माना जाता है । मैं ऐसी-वैसी लड़की नहीं हूँ । तुम मेरे पहले और अंतिम बॉय फ्रेंड हो.......” ।

राजीव बोला “मैंने तुम्हें पहले ही आगाह किया था कि आजकल ऐसी बहुत सी लड़कियाँ हैं जो बाते तो बहुत अच्छी-अच्छी करती हैं । अपने को चरित्रवान बताती हैं । लेकिन वे उतना ही चरित्रहीन होती हैं । एक नहीं अनेक बॉय फिरेंड बनाती हैं । रुपया-पैसा ऐंठती हैं । ऐश करती हैं । टाइम पास होता रहता है । कई तो दिन-रात फोन पे ही व्यस्त रहती हैं । इतने बॉय फिरेंड बना लिए हैं कि बात करने से ही फुर्सत नहीं रहती” ।

माधव बोला “प्रिया की बातों से मैं इतना प्रभावित हो गया था कि उसे सपने में भी गलत नहीं सोच सकता था । लेकिन शुक्र है भगवान का कि उसका खोया पर्स मेरे हाथ लग गया । जिसमें ऐसे पत्र मिलें जिनमें इतनी गंदी और अश्लील शब्दावली का प्रयोग हुआ था जो उसकी और उसके अन्य कई बॉय फिरेंड के चरित्र का बयान करते हैं” ।

राजीव ने कहा “ देर सही पर दुरुस्त जानकारी तो मिल गई । सच में आज देश-समाज की यही दशा है । आज के अधिकांश लोग खासकर लड़के-लड़कियाँ यह भूल चुके हैं कि-

गिरि से गिरकर जो गिरे, गिरे एकही बार ।

जो चरित्र गिरि से गिरे बिगड़े जनम हजार” ।।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.) ।

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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