गुरुवार, 10 नवंबर 2011

सत्यप्रसन्न की ग़ज़ल - गलियाँ हैं तंग यूँ कि; गुजरती नहीं हवा। हैरान धूप है; कि यहाँ पल रहे हैं लोग।।

कविता

हत्यारे

आजकल,

नहीं लगते हत्यारे,

पहले जैसे, खूँखार, क्रूर

और अमानवीय।

 

उनके चेहरे पर अब

होती है मासुमियत,

और व्यवहार से झलकता है,

अपनापन।

अब वे खामोशी से भी नहीं आते

बल्कि, बाकायदा देने लगे हैं

इश्तेहार, अपने आने का।

 

यहाँ तक कि

बयाँ कर देते हैं साफ़,

अपने क़त्ल करने क तरीका भी।

 

परहेज है उन्हें,

परंपरागत हथियारों से।

यकायक, कातिलाना हमला करना भी,

नापसंद है उनको।

 

ईज़ाद कर ली हैं उन्होंने,

नई-नई तकनीकें और यन्त्र-

कि, कैसे बंद की जा सकती हैं

चलती हुई साँसें।

और रोकी जा सकती हैं

धड़कनें दिलों की।

 

इतनी मोहक, आकर्षक

और दर्शनीय हो गई हैं

क़त्ल की

अधुनातन युक्तियाँ, उनकी

कि हम खुशी-खुशी

प्रस्तुत हो जाते हैं

अपने ही कत्ल के लिये,

आजकल।

 

--

ग़ज़ल

छल रहे हैं लोग

क़ालिख है चेहरे पे, मगर चल रहे हैं लोग।

दर्पण को दाग़दार बता; छल रहे हैं लोग।

 

कुछ हैं कि जिनके पास मुकम्मल जहान है।

बाकी अलाव में समय के; जल रहे हैं लोग।

 

गलियाँ हैं तंग यूँ कि; गुजरती नहीं हवा।

हैरान धूप है; कि यहाँ पल रहे हैं लोग।

 

वैसे ही बेहिसाब जलन और दर्द है।

घावों को खोल मिर्च और मल रहे हैं लोग।

 

मेरे शहर में आ के जरा; देखिये हुजूर।

बेजान पत्थरों में कैसे ढल रहे हैं लोग।

 

उर्वर बहुत थे; किन्तु; कभी फूल ना सके।

हैं जन्मजात बाँझ, मगर फल रहे हैं लोग।

 

कब तक सहेगी और सितम; क़ायनात भी।

हैं साफ़ इशारे कि उसे खल रहे हैं लोग।

--

"सत्यप्रसन्न"

कोरबा (छ.ग.)

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