शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

रघुनन्‍दन प्रसाद दीक्षित ‘प्रखर' की कविताएँ

कुल्‍हड़

मै कुल्‍हड़

माटी का जाया ।

सम्‍मान हृदय से

सबका पाया ॥

खाई खेत

कुम्‍हारी धरती

नाली गूल

बाग या परती

जॅह से मिली

खोद ली माटी

भरी टोकरी

घर पर लाया॥

कूटा पीटा

बेहरहमी से

रौंदा पैरो तर

गरमी से

पटक-पटक

नस टहलायी

निकल गया

जो मॉ ने खिलाया॥

चला चाक

ज्‍यों फिरकी घूमी

कुशल हाथ की

ममता चूमी

कुषल चितेरे ने

गढ़-गढ़ कर

मुझको सुन्‍दर सुघर बनाया॥

नर

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चार दिवस था

तप्‍त अवा में

जैसे रोटी

सिके तवा में

सांसें घुटती रही हवा में

खरा-खरा था

रक्‍त वर्ण मैं

दुख में सुख का

राग बजाया॥

सोंधी सौरभ

चाय से मुधरिम

अधर मिले

भूला अंर्तगम

फरामोष ने पीकर फेंका

पर-सच

अपना मैने

मोल चुकाया॥

 

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कैसै लोग,कैसी वृत्ति

सूखी हड्डियों से चिपका बालक भूख से व्‍याकुल हो

रुदन कर रहा था। इस पिंजर बनी देह में दूध

कहाँ उतरता । भिखारिन माँ की ममता से

सहन न हो सका और चल पड़ी सामने गली

की ओर। सम्‍भ्रात लगने वाले घर के सामने

गुहार लगायी “बहन मेरा बच्‍चा भूख से

व्‍याकुल है,एक कटोरी दूध दे दो,आपका

बडा एहसान होगा।”

घर से मालकिन जहर उगलती हुई बाहर निकली

”बस तुम लोग हराम की खाने के आदी हो।

जाओ.....भागो ........यहाँ से ।

बेबस लाचार भिखारिन ने मजबूर होकर

अपनी राह पकडी। गली के मुहाने पर शिव

मंदिर में शिवलिंग पर भक्‍तगण दूध चढा रहे

थे। इधर गोद में शिशु की आवाज मद्धिम

पडती जा रही थी। मरता क्‍या न करता,

भिखारिन ने अपना कटोरा शिव अरघा से से लगाया,

कटोरे में दूध लिया। जल मिश्रित दूध

शिशु के मुँह से लगाया। पेट भरने के बाद

शिशु सो गया,इधर भिखारिन सोचने लगी कैसै हैं लोग,कैसी वृत्ति ...........।

 

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तन्हा . तन्हा

तन्हा तन्हा

दिल बेगाना।

बेजा कोशिश

इनको पाना॥

इन्‍द्रधनुष सम

इनकी रंगत ,

कैसे लोगों की

बद संगत,

कैसी सुन्‍दर

मुग्‍ध मोहनी

जो भी लखे

वही दीवाना॥

इनकी यारी

बस दौलत हित,

जिसको सूंघा

वही दिखा चित,

मजनूं ख्‍वार

बैठकर तन्हा

गाऐं दर्दे दिली तराना॥

जब तक

रूपराशि मधुमासी,

तब तक

दौलत बारहमासी,

ढलका यौवन

भ्रमर नदारद

अब बीते कल का

कहाँ जमाना॥

इन जुल्‍फों में

जो भी उलझा,

कभी न वह

जीवन में सुलझा,

तिल तिल कर

तन मन धन गलता

नहीं जिन्‍दगी

सुने बहाना॥

इनकी चीखें

इनकी आहें

पैर पंक में

भटकी बाहें

नगरवधू की

घुटती सांसें

नहीं खुशी का

कभी ठिकाना॥

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फंसा पेंच में

नीति नियत में

खाई कितनी

स्‍वार्थ सिद्ध

अब शिष्टाचार।

गला काट स्‍पर्धा

पग पग

नहीं दम्‍भ का

पारावार॥

ओंठ सिले ,अरु.

कान खुले

आंखें देखें

बस काला,

बंदरबांट बराबर होता

कहाँ रुकेगा

भ्रष्टाचार॥

भूखी आंतें

रुदन कर रहीं

अस्‍मत . बसन

बिना सकुचे,

दारिद्रय कहो

कैसै मिट पाए

जब, फंसा पेंच में

हाहाकार॥

तुम ! मानव हो

मानव बन रहना

नहीं ,कभी भगवान बनो

सद्‌वृत्ति सहयोग परस्‍पर

रखें उच्‍चतम सद्‌ आचार॥

काली भेडों के

पहचानो

जिनके कुर्ते

लहू सने ,

‘प्रखर' कहो

नाखूनों से अब

रोकें हत्‍या अरु

व्‍यभिचार॥

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गजल

गाना चिड़ियों का

भोर वृक्ष पर अच्‍छा लगता गाना चिड़ियों का।

मुडेर बैठना अच्‍छा लगता आना चिड़ियों का॥

 

न जाने कब दोश लगा दें मंदिर मस्‍जिद ठेकेदार,

बने कदाचिद मजहब मुद्‌दा जाना चिड़ियों का॥

 

अम्‍बर अवनि बाग वन पोखर की तरुणाई में,

कब आयेगा पुनः लौटकर जमाना चिड़ियों का॥

 

कलरव हरण करे मन चंचल बाग बगीची गाँवों में

कैसे भूले रे मन तू स्‍वर तंत्र बजाना चिड़ियों का॥

 

विहग राग से गुंजित घाटी मधुमय जीवन जब था,

‘प्रखर' विलोप हुआ निर्झर में नहाना चिड़ियों का॥

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शान्‍तिदाता सदन

नेकपुर चौरासी फतेहगढ़ (उ0प्र0) 209601

मो0 नं0 08090228730

E-mail - Dixit4803@rediffmail.com

रचनाकार कनिष्‍ठ सैन्‍य अधिकारी है।

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