मंगलवार, 15 नवंबर 2011

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - सम्भव

सम्भव

मोहन एक दिन मेरे पास आया और बोला ‘क्या असम्भव सम्भव हो सकता है’ ? मैंने कहा कि जो सम्भव न हो उसे ही तो असम्भव कहा जाता है। लेकिन असम्भव की परिभाषा एक नहीं है। यह व्यक्ति और देश-काल पर भी निर्भर करती है’।

वह बोला ‘मैं ऐसे असम्भव को असम्भव नहीं मानता जो व्यक्ति और देश-काल पर निर्भर करता हो’।

मैंने कहा ‘ऐसा असम्भव जो व्यक्ति और देश-काल से परे हो, उसे खुद ईश्वर अथवा उनकी कृपा ही सम्भव कर सकती है। क्योंकि ईश्वर सबसे परे हैं, लेकिन ईश्वर से परे कुछ भी नहीं है’।

वह बोला ‘एक ऐसी घटना घटित हुई है जिससे असम्भव सम्भव हो गया है। लेकिन कोई मान ही नहीं रहा है। आप सुनिए और बताइये कि आप इसे सम्भव मानते हैं अथवा नहीं’।

मोहन आगे बोला ‘मम्मी ने पिछले साल लौकी और कद्दू के एक-एक फल रोक लिए थे। लौकी का फल पेड़ में पककर सूख गया था। कद्दू के फल की बाद में सब्जी बन गई थी और बीज रख लिए गए थे। अभी हाल में लौकी का सूखा फल तोड़कर बीज निकाला गया। हमारे यहाँ का ग्वाला जब बीज बोने चला तो मैं वहाँ मौजूद था। मैंने उससे लौकी का बीज ले लिया और कहा कि कद्दू की बुवाई तुम करो और लौकी मैं खुद बोऊँगा। मेरा छोटा भाई जो पास में ही खड़ा था। उसने ग्वाले से कहा कि लौकी कद्दू की अपेक्षा अधिक फलती है। इसलिए भैया लौकी बोने जा रहे हैं। ताकि कह सकें कि बोया किसने था।

हमने बुवाई कर दिया। पौधे जमने लगे। बाड़ लगा दिया गया। लेकिन लौकी के बीजों से जो पौधा निकला उसमें कद्दू फल रहा है। और पौधे भी कद्दू के ही दिखाई पड़ते है। जो बीज ग्वाले ने बोये थे वे कद्दू के बीज थे और उससे कद्दू फल भी रहा है। लेकिन मैंने जो लौकी के बीज बोये उससे लौकी न फलकर कद्दू फल रहा है।

मैं जिससे यह बात बताता हूँ। वही हँसी में टाल देता है। कोई इसे सच नहीं मानता। यहाँ तक मम्मी और पापा भी कहते हैं कि जैसा ग्वाला है वैसे तुम दोनों भाई। कहीं ऐसा हो सकता है कि लोकी के बीज से कद्दू का पौधा उगे। तुम लोगों ने इस बार लौकी बोया ही नहीं। इस घटना पर आप क्या कहते हैं’ ?

मैंने कहा ‘न तुम पागल हो न तुम्हारा भाई और न ही ग्वाला ही। उन दोनों की बात छोड़िये। जहाँ तक मैं तुम्हें जानता हूँ। तुम झूठा प्रचार नहीं करोगे। कम से कम मेरे पास अनर्गल बात लेकर नहीं आओगे। अतः मैं तुमसे सहमत हूँ कि ऐसा सम्भव हो सकता है। कृषि वैज्ञानिक भविष्य में ऐसी प्रजाति विकसित भी कर सकते हैं जो एक सत्र में एक फसल दे और दूसरे में दूसरी। लेकिन ऐसा अब तक नहीं हुआ है। यह उनके लिए भी आसानी से सम्भव नहीं है।

दुनिया में कई चमत्कार होते रहते हैं। कोई ध्यान देता है। कई ध्यान नहीं देते। कोई मानता है। कई नहीं मानते। कई घटनाएँ हमारी बुद्धि और विज्ञान की पहुँच से परे होती हैं। केवल इसलिए ही उन्हें गलत मान लिया जाता है। जो कि गलत है। हमारी बुद्धि और विज्ञान से परे एक ऐसी सत्ता है जिससे असम्भव भी सम्भव हो सकता है’।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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