मंगलवार, 22 नवंबर 2011

पद्मा शर्मा की कविता - कामगार बच्चे

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कामगार बच्चे

आज बालदिवस है अख़बारों में

फेक्टरी में नहीं, जहाँ काम कर रहे हैं बच्चे ...

टी व्ही चैनलों में बाल दिवस खिलखिला रहा है

... ढाबे, होटलों और रेस्तरां में

चाय के झूठे गिलास धो रहे हैं बच्चे...

जिन घरों के बच्चे गए हैं बाल मेला

चाट-पकोड़ी, पिज्जा-पेस्ट्री खाने

उन्हीं घरों में काम कर रहे हैं बच्चे ...

 

मुट्ठी भर बच्चे कर रहे हैं

मौज-मस्ती, सैर-सपाटा

ले रहे हैं भाग कार्यक्रमों में

पर शेष बचे बच्चे ...

बहुत सारे बच्चे ...

 

पेट की भूख शांत करने

परिवार का भरण-पोषण करने

जूझते रहे,थकते और पिसते रहे बच्चे ...

तमाम कस्बों, नगरों और मुख्य चौराहों पर

दर्जनों बच्चे...रोज की भांति

हाथ में भुट्टे, मूंगफली ,

चने, पानमसाला और

चाय की केतली लिए

आवाज लगाते रहे बच्चे

सब चीजें बेचते रहे बच्चे ...

 

कहने को ये समाज का ,

देश का, राष्ट्र का

महत्वपूर्ण अंग हैं

कई संस्थाएँ हैं आत्ममुग्ध

इनकी खुशहाली को लेकर

कई कल्याणकारी योजनायें चल रही हैं

कागजों पर

किसी विशिष्ट दिन बढचढ़कर बोलती हैं

फिर हो जाती हैं अदृश्य

एक दिन में ही ध्वस्त हो जाती है ऊर्जा

और नियम भी ...

 

और समाज का अंग भंग हो जाता है

योजनायें सफल हो रही हैं कागजों में

बालदिवस के सफल समारोहों में

नियमों के सफल क्रियान्वयन की

ख़बरों से पटे पड़े

अख़बारों को बेच रहे हैं बच्चे

अपने समय के सच को झेल रहे हैं बच्चे ...

--

(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com  , फतुहा, पटना की कलाकृति)

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