रविवार, 4 दिसंबर 2011

उमेश मोहन धवन की लघुकथाएँ

(लघुकथा)
अमृत कलश

वह दफ्तर कुछ ऐसी जगह पर था जहाँ दूर दूर तक चाय की कोई दुकान नहीं थी इसीलिये दफ्तर में ही एक कैंटीन बनवा दी गयी थी जिसकी देखरेख चंदा किया करती थी. चंदा सारा दिन मुस्तैदी से चाय, काफी व हल्का नाश्ता इस सीट से उस सीट पर पहुँचाते थकती नहीं थी.

´´छोटू क्या बात है आज ग्यारह बज गये पर चाय अभी तक नहीं आयी ?´´ लम्बे इन्तजार के बाद सक्सेना जी ने चपरासी को आवाज दी

´´चंदा आज छुट्टी पर है साहब. उसकी तबीयत खराब है.´´ चपरासी संक्षिप्त सा उत्तर देकर निकल गया.

´´क्या´´ सक्सेना जी बेचैनी से इधर उधर टहलने लगे. बिना चाय के काम की शुरुआत करने की उनको आदत नहीं थी. वापस आकर उन्होंने एक फाइल के पन्ने बेवजह उल्टे पल्टे फिर बंद करके कुर्सी में ढेर हो गये.

´´अरे भई छोटू देखना चाय कहाँ रह गयी ´´ मिश्राजी ने भी वही सवाल दोहराया तथा उन्हें भी वही जवाब मिला.

आठ-दस चाय रोज पीने वालें लोगों के हाथों में आज जैसे जान ही नहीं रह गयी थी. चंदा दो दिन और नहीं आयी.

´´छोटू इधर आ´´ चौथे दिन वर्माजी ने छोटू को बुलाया और उस पर बुरी तरह फट पड़े ´´अरे तुम लोगों से चाय का कोई और इंतजाम नहीं हो सकता है  क्या ? तीन दिन हो गये एक फाइल तक आगे नही बढ़ी है. एक काम तुम लोगों से.... ´´

´´चंदा आ गयी है साहब किचन में चाय बना रही है.´´ छोटू नें मरते हुये लोगों को जैसे जीवनदान दे दिया हो.

इतने में चंदा चाय लेकर आ भी गयी. ट्रे में रखे चाय के प्याले अमृतकलशों जैसे लग रहे थें

´´चंदा क्या हो गया था तुम्हें. अब कैसी तबियत है तुम्हारी.´´ सब एकसाथ अपने अपने ढंग से उसका हाल पूछ रहे थे. पता नहीं वे उसका हाल पूछ रहे थे या उससे अपना हाल बताना चाह रहे थे. उन्हें देखकर ये पता लगाना तो कठिन था कि तीन दिन तक तबियत वास्तव में किसकी खराब थी पर आज उस दफ्तर में फिर से जान अवश्य पड़ गयी थी.

 

मुबारकबाद

"मम्मी बगल वाले सिंह अँकल का बेटा फौज में चुन लिया गया" विनय नें सरिता को यह खुशखबरी दी. "अरे ये तो बड़ी खुशी की बात है. अब तो वह अपनी माँ के साथ भारत माँ की भी सेवा करेगा. भगत सिंह, आजाद जैसे देशभक्तों का आज भी देश सम्मान करता है. भारत माँ को आज ऐसे ही सपूतों कि जरूरत है. सरिता के उत्तर से उत्साहित होकर विनय नें एक और खुशखबरी सुनायी. " माँ में डर रहा था इसलिये आपको पहले नहीं बताया. दरअसल हम दोनो का सेलेक्शन एक साथ ही हुआ है." "क्या" सरिता की आँखें चौड़ी हो गयीं. "नहीं बेटा मैं तुम्हें फौज में नहीं जाने दूंगी. पता है कितना खतरा होता है वहां ? आजकल आतंकवाद भी कितना फैला हुआ है. ऊपर से जिन्दगी भर के लिये हमसे दूर भी रहना होगा. तुम्हारे लिये और नौकरियों की कमी है क्या ? " सरिता ने अपनी पूरी छटपटाहट बिखेर दी . " पर मां अभी तो तुम कह रही थी कि भारत माँ को भगत सिंह आजाद जैसे सपूतों की जरूरत है." " हां बिल्कुल जरूरत है. पर मैं यह तो नहीं कह रही थी कि भगत सिंह मेरे ही घर में पैदा हो जाये . भगत सिंह पैदा जरूर हों पर पडौस में हों तो ही अच्छा." "पर मां" विनय ने एक बार फिर से कोशिश की. " मुझे कुछ नहीं सुनना है. कह दिया ना कि तुम नहीं जा रहे हो बस." अभी तुम्हारे पापा आते ही होंगे. उनके साथ सिंह फैमिली को मुबारकबाद देने चलेंगे " इतना कहकर सरिता रसोई में चली गयी.

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परिचय

नाम : उमेश मोहन धवन

जन्म : 14.02.1959

शिक्षा : एम. काम.

प्रकाशन :अनेक उच्चस्तरीय पत्रों पत्रिकाओं में लघुकथाओं कविताओं तथा हाइकुओं का अनवरत प्रकाशन

कृतियां : लघुकथा संग्रह पीर परायी (प्रकाशनाधीन)

संप्रति : यूनियन बैंक आफ इंडिया में प्रबंधक के पद पर कार्यरत

संपर्क : 13 / 134, परमट, कानपुर 208001 (उ.प्र)

 

e-mail um.dhawan@yahoo.com

umdhawan@gmail.com

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