रविवार, 11 दिसंबर 2011

एस. के. पाण्डेय की बाल कविता - जाड़ा

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जाड़ा

(१ )

भैया बीत गई बरसात ।

हो गई जाड़े की शुरुआत ।।

देखो तो इसकी औकात ।

कैसे सबकी कपांए गात ।।

(२)

दिन-दिन बढ़ता जाए जाड़ा ।

आते ही बच्चों को ताड़ा ।।

बूढों को तो बहुत लताड़ा ।

सबको इसने सही पछाड़ा ।।

(३)

बच्चे, बूढ़े लोग-लुगाई ।

लगते जैसे गए मोटाई ।।

कम्बल, स्वेटर और रजाई ।

सबको अब इनकी सुधि आई ।।

(४)

ठंढ़ी हवा कपांए हाड़ ।

बूढ़े कहते कितना जाड़ ।।

काँपे गैया, बिल्ली, सांड़ ।

ढके बर्फ से बड़े पहाड़ ।।

(5)

पंखे का न कोई काम ।

खुस्की आए सबके चाम ।।

काँपे बूढ़े कहते राम ।

लगता अबही दूर मुकाम ।।

(६)

छिप गए बिच्छू छिप गए सांप ।

बहुत से कीड़े अपने आप ।।

मर गए जाड़े के प्रताप ।

मुँह से सभी उड़ायें भाप ।।

(७)

ठंढे जल से डरते लोग ।

बढ़ गया जिनके गठिया रोग ।।

कितनों दिए नहाना छोड़ ।

जंह-तहँ सेकें कर व गोड़ ।।

(८)

लेकिन नहीं ये अच्छी बात ।

नहाना चहिए बड़े प्रभात ।।

दिनचर्या न दीजै छोड़ ।

थोड़ा-बहुत आ सकता मोड़ ।।

(९)

मौसम में जाड़े का जोड़ा ।

सच में कोई न कुछ भी थोड़ा ।।

किसी को भी न इसने छोड़ा ।

राजा बना लगाये कोड़ा ।।

(१०)

कुहरे ने भी आफत लाई ।

सूरज बाबा गए लुकाई ।।

कुछ भी पड़ता नहीं दिखाई ।

मोटर, गाड़ी चलो बचाई ।।

बच्चों करते रहो पढ़ाई ।

कुछ दिन गए परीक्षा आई ।।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.) ।

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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1 blogger-facebook:

  1. पाण्डेय जी,
    मुझे कुछ दिन पहले 'जाड़े' पर लिखी श्रेष्ठ लघु कविताओं की जरूरत थी... लेकिन आज जब आपकी 'जाड़े' विशेष पर कवितायें देखीं तो 'मुख' से 'लाजवाब' स्वतः निकल पड़ा... आपकी आरंभिक दो कविताओं का तो कहना ही क्या वे वास्तव में बेजोड़ हैं... साधुवाद...

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