रविवार, 11 दिसंबर 2011

शंकर लाल कुमावत की हास्य-व्यंग्य कविता : गधे और किसान

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गधों की जमानत और किसान

एक बार खेत में किसान की सहायता के लिए

बहुत से गधे चुने गए

लेकिन सहायता के नाम पर

कुछ गधे गजब ही कर गए

किसान का पूरा का पूरा खेत ही चर गए

चरने तक तो ठीक था

मगर जाते जाते खेत को लीद से भर गए

और तो और आने वाली पीढ़ी के लिए

मेड़ में छेद कर गए

किसान ने मामला अदालत में पहुंचाया

न्याय के लिए गिड़गडाया

आरोपों की सफाई के लिए

जज ने गधों को अदालत में बुलाया

गधों ने बचाव में

एक से बढ़कर एक तर्क बताये

एक गधे ने फरमाया -

हमने अपनी प्रजाति बचाने के लिए

मज़बूरी में ये कदम उठाया

जज ने पूछा कैसे

तभी दूसरे गधे ने समझाया

हुजूर, यदि हम फसल नहीं खाते

तो ये किसान बहुत अमीर हो जाते

अच्छे बुरे को पहचानने लग जाते

फिर तो हम गधों को छोड़, घोड़े ले आते

ऐसे में हम गधों के बच्चे तो भूखे ही मर जाते

और हम खाम खा इतिहास बन जाते

तभी एक और गधा आगे आया

उसने अपना नया ही तर्क बताया

ये सही है की हमने खेत चरा है

मगर खेत को लीद से भी तो भरा है

जिससे किसान अगली फसल तैयार कर पायेगा

और अपना पेट भर पायेगा

ये ठीक है कि उसके पहले

हमारा नम्बर आएगा

और बचा तो वो भी खायेगा

वैसे भी वो मालिक हम नौकर हैं

उसने ही हमें पहले परखा है फिर चुना है

इसलिए अब हम कही और नहीं जायेंगे

अगले चुनाव तक इसका ही खायेंगे पियेंगे और चरेंगे |

इन बेतुके तर्कों पर जज को गुस्सा आया

उसने सभी गधों को जेल पहुँचाया

इस पर पहले तो सारे गधे जोर से कूदे

फिर दुल्लती चलाये

मगर, जब खाया जेल का खाना तो पचा नहीं पाये

जो दौड रहे थे कल तक

उनमें से किसी को किडनी

तो किसी को हार्ट के दौरे आये

फिर तो सभी इलाज के नाम पर जमानत लेकर

किसान के खेत में फिर से चरने चले आये

अब आप ही बताये

बेचारा किसान कहां जाये और कहां गुहार लगाये

क्योंकि अब तो गधे जमानत लेकर हैं आये

कहो अब बेचारा किसान कहां जाये ?

बेचारा किसान कहां जाये ?

--

शंकर लाल

इंदौर- मध्यप्रदेश

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