गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - व्यवस्था

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व्यवस्था

रामू ने पूछा “दिनों-दिन तरह-तरह की आपदाएँ बढ़ती जा रही हैं। इसका क्या कारण है ? कहीं सुनामी, कहीं भूस्खलन, कहीं भूकम्प, कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा आदि से जन जीवन तबाह होता रहता है”।

मैंने कहा “ इसका प्रमुख कारण असंतुलन है। प्रकृति में धीरे-धीरे असंतुलन की स्थिति बढ़ती जा रही है। ईश्वर ने सृष्टि करके प्रकृति की एक व्यवस्था बनाई थी। आज तक उसे कोई समझ नहीं सका। बड़े-बड़े साधु-संत, ऋषि-मुनि भी उस व्यवस्था को पूरी तरह से नहीं समझ सके। और आज के लोग उस व्यवस्था से यानी प्रकृति से ही छेड़छाड़ करने लगे हैं। और जब किसी व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ की जाती है तो उसके परिणाम सामने आते ही हैं। अतः प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करने के गम्भीर परिणाम तो भुगतने ही पड़ेगें”।

रामू बोला “ आखिर वैज्ञानिक कोई समाधान क्यों नहीं ढूढ़ते ? विज्ञान से तो बहुत कुछ किया जा सकता है”।

मैंने कहा “ अरे पगले विज्ञान से सब कुछ तो नहीं किया जा सकता। लोग और मुख्यतः नवयुवक यह विल्कुल नहीं समझते कि वस्तुतः आज तक विज्ञान के द्वारा जो कुछ भी किया गया है, वह उसी व्यवस्था को समझने के प्रयास के दौरान ही सम्भव हो सका है। और आज भी विज्ञान उसी व्यवस्था को समझने का प्रयास कर रहा है”।

रामू बोला “क्या मनुष्य विज्ञान की मदद से उस व्यवस्था को कभी समझ पाने में सफल हो सकेगा” ?

मैंने कहा “ कभी नहीं। क्योंकि यह व्यवस्था बहुत ही जटिल है। और इसके आगे मानव बुद्धि बिल्कुल एक शिशु के समान है। जैसे छोटे बच्चे को कई खिलौने दे दिए जाय तो वह कभी एक से खेलता है और कभी दूसरे से और कभी तीसरे से...। वह यह निश्चित ही नहीं कर पाता कि किससे खेले और किससे न खेले। कभी-कभी तो वह सारे खिलौने एक साथ हाथ में लेना चाहता है। पर सभी पकड़ में ही नहीं आते। और जो आते हैं वो भी धीरे-धीरे गिरते जाते हैं।

ठीक ऐसे ही विज्ञान से जब हम कोई रहस्य समझते हैं या समझने का प्रयास करते हैं तो इसी दौरान दूसरा रहस्य आ जाता है जो हमें पहले से पता ही नहीं होता। इसी तरह तीसरा और चौथा ....। इस प्रकार खोज पर खोज जारी रहता है। पर रहस्य समाप्त ही नहीं होते। लेकिन कितनी महान है यह व्यवस्था कि जिसके कुछ अंश तक समझ लेने से इतने सारे आविष्कार हो गए।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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(चित्र - रेखा की कलाकृति)

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