शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

सन्तोष कुमार सिंह की कविताएँ

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1.वही तो प्यारा गाँव मेरा है

किसानों का होता बसेरा है।

खेतों में ही निकले सबेरा है।

वही तो प्यारा गाँव मेरा है।।

 

माटी की सोंधी-सोंधी गंधें।

बौरे आम-महुआ की सुगंधें।

होता रहे पवन का फेरा है।

वही तो प्यारा गाँव मेरा है।।

 

कभी स्वाँग, ढोला, नटों का जहाँ।

पनघट पर जमघट घटों का वहाँ।

लगता रहे सुबह-शाम फेरा है।

वही तो प्यारा गाँव मेरा है।।

 

गर्म रेतें तलवे जलायें जहाँ।

पगडंडियाँ भी इठलायें वहाँ।

बाढ़, कभी कोहरा घनेरा है।

वही तो प्यारा गाँव मेरा है।।

 

लेकगीतों पर थिरके हैं पाँव।

दुपहरी कटती छप्पर की छाँव।

हो चिरागों का जहाँ उजेरा है।

वही तो प्यारा गाँव मेरा है।।

 

योजना सरकारी भी है चली।

खम्भे भी बढ़ गए गली-गली।

फिर भी रहता वहाँ अँधेरा है।

वही तो प्यारा गाँव मेरा है।।

--------------

 

2.बदला-बदला सा लगता है

बदला-बदला सा लगता है, मुझको अपना गाँव रे।

जिस बरगद के नीचे खेले, मिली न उसकी छाँव रे।।

 

मिले न हमको चौपालों पर गुड़-गुड़ करते हुक्का भी।

करें न अब छिड़काव मुश्क से, समारोह में सक्का भी।।

 

बैलों के हल दिखें न मुझको, और न भैंसा गाड़ी है।

दुल्हिन उतर रहीं कारों से, रथ की चुकी सवारी है।।

 

बम्बा के पानी में ठिठुरें, अब न निशा में पाँव रे।

बदला-बदला सा लगता है, मुझको अपना गाँव रे।।

 

दिल छोटे हो गए रही ना, कोई आपसदारी है।

ज्योंनारों के वक्त गवें ना, मीठी-मीठी गारी है।।

 

चौपालों की रंगत खोई, अघियाने भी ठिठुर गए।

कच्ची घानी के कोल्हू के, अंग-अंग सब बिखर गए।।

 

पड़ा न झूला किसी डाल पर, ढूँढी सारी ठाँव रे।

बदला-बदला सा लगता है, मुझको अपना गाँव रे।।

 

संघ्या को पशुओं की हेड़ें, गऊधूल की महक नहीं।

कमल-दलों की किसी ताल में, दिखती कोई चमक नहीं।।

 

प्रियतम की पाती का नारी, अब न प्रतीक्षा करती है।

मोबाइल से बातें करती, जब भी इच्छा करती है।।

 

नौटंकी, ढोला हैं दुर्लभ, सूने लगते गाँव रे।

बदला-बदला सा लगता है, मुझको अपना गाँव रे।।

 

ताल-तलैया, पोखर सूखीं, सूख गए हैं कूँए भी।

बच्चे खाँय न सीरा-फुलका, खोए लपसी,पूए भी।।

 

अब न बरातों में होता है, नाँच घोड़ियों वाला भी।

नहीं खोइया शादी में हो, खेल कौड़ियों वाला भी।।

 

फिल्मी गीतों का भारी है, लोकगीत पर दाँव रे।

बदला-बदला सा लगता है, मुझको अपना गाँव रे।।

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3. चलें यहाँ से दूर

ले चल प्रियतम अब हमको भी, दूर कहीं अति दूर।

ये नदिया बन कर आई है, क्रूर अधिक ही क्रूर।।

 

धीरे-धीरे अँधियारे में, यह घर में घुस आई।

डूबे गेहूँ, बर्तन, खटिया, चादर, खोर, रजाई।।

 

प्राण बचाने कब तक छत पर, बैठेंगे मजबूर।

ले चल प्रियतम अब हमको भी, दूर कहीं अति दूर।।

 

मील सैकड़ों दीख रहा है, प्रियतम जल ही जल है।

ये तो बाढ़ नहीं लगती है, लगती क्रूर प्रलय है।।

 

चुन्नू-मुन्नू बैठे इस छत, उस छत अल्लानूर।

ले चल प्रियतम अब हमको भी, दूर कहीं अति दूर।।

 

इस घर में ही मैंने छेड़े, निशदिन हुलस तराने।

जीवन भर हमने-तुमने भी, गाये मंगल गाने।।

 

जान बची तो लाखों पायें, भागो अभी हुजूर।

ले चल प्रियतम अब हमको भी, दूर कहीं अति दूर।।

 

बाहर पानी, भीतर पानी, ऊपर बादल बरसें।

भैंस खड़ीं पानी में बाहर, चारे को भी तरसें।।

 

इस पानी से हार गए हैं, बड़े-बड़े सब शूर।

ले चल प्रियतम अब हमको भी, दूर कहीं अति दूर।।

 

डूब गई सब फसल हमारी, अब कैसे उबरेंगे ?

जान बचे तो किसी शहर में, मजदूरी कर लेंगे।।

 

सुधि लेने सरकार हमारी, पहुँचे यहाँ जरूर।

ले चल प्रियतम अब हमको भी, दूर कहीं अति दूर।।

 

----सन्तोष कुमार सिंह

'चित्रनिकेतन' बी 45 मोतीकुंज एक्सटेन्शन

मथुरा-281001

 

साहित्यकार परिचय

1

नाम

सन्तोष कुमार सिंह

2

जन्म तिथि

08 जून 1951

3

सम्प्रति

सेवानिवृत उत्पादन अभियन्ता, इंडियन ऑयल कारपोरेशन लि0, मथुरा रिफाइनरी मथुरा, उ0प्र0।

4

लेखन

गीत, गजल, कहानी, बालगीत, हाइकु कविताएँ, हास्य-व्यंग्य कवितायें।

5

प्रसारण व प्रकाशन

आकाशवाणी मथुरा से कविताओं का प्रसारण। कविताओं का अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन। कविमंचों से हास्य-व्यंग्य कविताओं का पाठ। नियो टी0वी0 मथुरा, जैन टी0वी0 एवं साधना टी0वी0 दिल्ली से कविताओं का प्रसारण। शरजाह से प्रकाशित इन्टरनेट वेब पत्रिका 'अनुभूति' में कविताओं का प्रकाशन जारी। अमेरिका से प्रकाशित 'कविता कोष में कविताओं का संकलन। अमेरिका से प्रकाशित विश्व स्तरीय 'ई-कविता ग्रुप्स' में कविताओं का अनवरत प्रकाशन जारी।

6

प्रकाशित कृतियाँ

परमवीर प्रताप (खण्ड काव्य) पेड़ का दर्द (पर्यावरण शिक्षा बालगीत) सुन रे मीत नारी के गीत (गीत संकलन) आलोक स्मृति (शोक काव्य) पर्यावरण की कहानी ददा जी की जुबानी (पर्यावरण बाल उपन्यास) हाथी गया स्कूल (बालगीत) बन्दर का अद्भुत न्याय (बालगीत) आस्था के दीप (हाइकु कवितायें) आइना सच कहे (हाइकु कवितायें) अछूत कन्या (कहानी संग्रह) द्वादस ज्योर्तिलिंग कथा (शिव गीत कथा ) नीति शतक काव्यानुवाद (संस्कृत से हिन्दी में अनूदित) नन्हे बच्चे प्यारे गीत (बालगीत) गीत गुंजन (बालगीत) हाइकु गंगा (हाइकु संग्रह) क्या होता है थाना (हास्य व्यंग्य संग्रह) गीत सुधा (स्वास्थ्य पर आधारित बाल गीत गाँव कहीं पर खो गए (गीत संग्रह) सुरक्षा शतक (कुण्डली काव्य संग्रह) मालनामा (सोलह पृष्ठीय लम्बी हास्य कविता) अनुरंजिका (गीत संग्रह) कवितायें विज्ञान की (भौतिक विज्ञान पर बाल गीत)

7

सम्पादन

तीन पुस्तकों का सम्पादन तथा दो पुस्तकों में सम्पादन सहयोग।

8

पुरस्कार व सम्मान

पं0 रामनारायण शास्त्री कहानी पुरस्कार इंदौर (म0प्र0) 'कवि श्री' सम्मान, कवि सभा दिल्ली से। इंडियन ऑयल मुख्यालय द्वारा निबन्धों पर कई बार प्रथम पुरस्कार। श्री हरिदास बजाज हास्य पुरस्कार, मथुरा से। साहित्य सिरोमणि सम्मान, कलांजलि साहित्यक संस्था लखनऊ/मथुरा से। साहित्य गौरव सम्मान, अखिल भारतीय कवि सभा दिल्ली से। सृजन सम्मान, विश्वम्भर दास चतुर्वेदी स्मृति समिति, मथुरा से।

9

सम्पर्क सूत्र

'चित्रनिकेतन' बी 45 मोतीकुंज एक्सटेंशन मथुरा उ0प्र0।

3 blogger-facebook:

  1. bahut achchi kavitayen hain aadhunik vaad ka gaon me saaf asar ko darshati kavitayen.

    उत्तर देंहटाएं
  2. Santosh ji ki teeno rachnaayen bahut hi marmik hai.Ravi ji v Santosh ji dono ko sadhubad.

    उत्तर देंहटाएं
  3. डा. प्रदीप गुप्त, अखिल भारतीय कवि सभा, दिल्ली1:23 pm

    शहर की चकाचैंध में गाँवों की आभा धूमिल पड़ती जा रही है। श्री संतोष कुमार सिंह ने गाँव का सजीव चित्रण किया है। कविता पढ़ते पढ़ते गाँव की माटी की सौंधी महक आने लगती है। गाँव हमारे जीवन के अभिन्न अंग हैं। सुन्दर कविताओं के लिए श्री संतोष कुमार सिंह को ढेरों बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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