शनिवार, 17 दिसंबर 2011

विजय कुमार शर्मा "आज़ाद" की कविता

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ऐ बरसते मेघ , ना भिगा मेरे तन को

ऐ बरसते मेघ , ना भिगा मेरे तन को

क्यों ये आग सी लगी है , मेरे मन को

मैं अभागा हूँ पर , कौतूहल है सबको

मेरी पीर में मजा आया , मेरे रब को

क्यों खामोश जी रहा हूँ , मैं क्षण क्षण को

ऐ बरसते मेघ , ना भिगा मेरे तन को

 

मुझे तो लूट लिया, किसी के शबाब ने

उसके मस्त नैन ने , उसके हाव भाव ने

दूर था पर, मिला दिया उसकी छांव ने

मुझ 'आज़ाद' को विवश किया , उसकी चाव ने

मैं तो उठ चल दिया , विरह के वन को

ऐ बरसते मेघ , ना भिगा मेरे तन को

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