संजय कुमार की कविता - बुरा आदमी

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बुरा आदमी

हां मैं बुरा आदमी हूं,

ऐसा लोग कहते हैं,

और मैं ये जानता हूं,

कि लोग ऐसा कहते हैं ।

नहीं करता मैं समझौता,

झूठ के साथ,

और नहीं करता समर्थन,

गलत बात का,

भीख भी नहीं देता मैं,

हट्‌टे-कट्‌टे नौजवान को,

डांट भी देता हूं,

भिखारी बालक को,

मैं कह देता हूं मुंह पर,

सच्‍ची बात,

और तोड़ देता हूं दिल दोस्‍तों का भी,

माफी भी नहीं मांगता फिर उनसे,

मेरे दोस्‍तों की संख्‍या भी ज्‍यादा नहीं है,

क्‍योंकि मैं बुरा आदमी हूं,

और मैं ये जानता भी हूं।

रुठ जाती है, कई बार पत्‍नी भी,

उलाहना भी देती है,

और फिर कर लेती है स्‍वीकार,

मेरे कटु निर्णय को

नहीं तोड़ने देता मैं बच्‍चों को,

पेड़ से कच्‍चे फल,

और कचरा भी नहीं फेंकने देता मैं, गली में,

पड़ोसियों को,

मेरा काम नहीं है, ये जानते हुए भी,

मैं लड़ जाता हूं, अनजान के लिए,

जानकारों से भी, इंसाफ की खातिर,

मैं नहीं करता सिफारिश किसी की भी,

लोग मुझे सनकी कहते है।

मैं चल पड़ता हूं, विपरीत

व्‍यवस्‍थाओं के भी

मैं बुरा आदमी हूं ऐसा लोग कहते हैं

और मैं जानता हूं

कि लोग क्‍या कहते हैं,

पर मुझे नहीं पड़ता फर्क

नहीं आती शर्म,

बुरा आदमी कहलाने में

अब आप ही बताइये

क्‍या मैं बुरा आदमी नहीं हूं ?

--

संजय कुमार 

वास्ते भारतीय खाद्य निगम 

खाद्य संग्रहण आगार 

हनुमानगढ़ टाउन

३३५५१३

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