रविवार, 25 दिसंबर 2011

राजा अवस्थी के गीत


   
मनपाखी चल उड़ जा

यों पलते अनुभव में
तिक्त अम्ल क्षार;
आफत पर आफत ज्यों
सूद से उधार;

रोज वही सुबह-शाम
दोपहरी-रात;
जेहन में नून-तेल
रोटी की बात;
ढिबरी का तेल चुका
फैला अॅंधियार।

भाग्य नहीं बदला,
पर उम्र कट गई;
बेटों में रोटी-सी
भूमि बॅंट गई;
चिख-चिख में सिमट गया
वसुधा भर प्यार।

रिश्ते एहसान लगें
ऐसे व्यवहार;
झेलेगा कब तक ,भर
आंखों में प्यार;
मन पाखी चल उड़ जा
घाटी के पार।




चाँद को निहारना

अरसे से भँवर बीच
हाथ-पाँव मारना;
छूने की आशा में
नन्हे से बच्चे का
      चाँद को निहारना।

प्राण वायु काँधे रख
बैठ कर विमानों में
     नभ में उड़ते खोजी दस्ते;
चाँद बसेंगे जाकर
अपने बोये फल से
     छूटेंगे क्या इतने सस्ते;
मस्तक में बोकर नासूर
टोपी के ये नकली
     बाल क्या सँवारना।

चंदन वन काट-काट
शव का श्रृंगार किया
     शिशुओं को है शव-सा जीवन;
यौवन में सन्नाटा
मरघट-सा छाता है
     आस-ओस दुर्लभ आजीवन;
यश अर्जन को होता
भूख का हमारी
     साहित्य में उतारना।





आ बैठें साथ

कुछ तेरी कुछ मेरी
            हो जाये बात
आ बैठें साथ।

कितने दिन से बीड़ी
साथ नहीं पी;
बंद पड़ीं सुख-दुख की
मन में सीपी;
अनुभव का सारा ही
खारा गुजरात।

मालूम भी हैं कुछ
घर-गांव के हाल;
सुनते हैं लड़कों ने
बदली चाल;
गाली मुंह में बसती
छुरियों पर हाथ।

संबंधों का संगम
लुप्त हो चला;
वैयक्तिकता में
सौहार्द खो चला;
घर का घर वालों को
हाल नहीं ज्ञात।






कब तक हो पाएगा निबाह

अंधकार का सागर है
गहराई स्याह है अथाह
कब तक हो पाएगा निबाह।

यादों में आँगन भर धूप
      आसमान से उतर रही;
नागफनी पोषक नगरी
      पंखुड़ियों को कुतर रही;
बाबा के आमों का बाग
रह-रह कर छोड़ रहा आह।


      वर्जित है रोशनी प्रवेश;
आयातित पाखंडों में
      पूरी पीढ़ी पूरा देश;
लय टूटे छंद खो रहे
गीतों का रुक रहा प्रवाह।

ऊँची दीवारों के बीच
      अँधियारे का बढ़ा दबाव;
ब्रेकडान्स के पलते मंच
      छिनते आकाश का प्रभाव
अँजुर भर धूप के लिए
तकते हैं पूरा सप्ताह।





चल बेटे राम

चल बेटे राम
सोजा! अब रात ढली
प्रातः तो होना है
फिर भागम-भाग।
       रीढ़ तोड़ बोझ लिए
       भाग रहे
       अनजाने पर्वत की चोटी को पाने;
       ऊँचे तो हुए नहीं
       चोटी पा
       धँसता ही जाता धड़ अपने पैताने;
रोज सुबह-शाम
जाने क्यों होती है
बस मेरे रेहड़ में
यह आगम-आग।
       सुखा रहे अंतड़ियाँ
       अपना यह
       जीने का उपक्रम है भाई;
       थोड़ी सी आमद में
       बेटा हैं
       माँ,दद्दा,पत्नी औ’भौजाई;
ठंडी में ठिठूर-ठिठुर
अकड़ूमल हो तिरकेतीन
भोजन में बीबी की
नित सरगम-साग।
       गलाफाड़ चिल्लाते
       खड़े हुए
       चिथड़ूमल, नकबहने बच्चों के बीच;
       कितना बक-झक करलो
       ढंग नही बदलें ये
       अपनी ही जान गई हीच;
दफ्तर के धाम
रोज-रोज परवाने
बस जगते की खातिर
है जागम-जाग।

पढ़ो चित्रकोटी अब
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अनपूरित इच्छायें
अनचाही पीड़ायें
रचतीं अनुप्रास,रोज आस-पास।

दूध-भात रोटी तो
पढ़ो चित्रकोटी तो
उपवासी कुर्सी कोरबड़ी का भोग;
तोंद बढ़े रोज-रोज
होटल में भोज रोज
नित्य नई मुर्गी की चाह लगा रोग;
समझो रानी समझो,
बैठी हो खुश तुम जो
चाहत का व्यास,घटे आस-पास।

रोज एक मकड़ जाल
जेहन में डाल-डाल
सपने सतरंगी कर दिए मनीप्लांट;
सुविधा का एक साँप
मन पूरा नाप-नाप
देह की पिटारी में कैद है अशांत;
भाते या ना भाते
स्वार्थरत ये नाते
खोकर एहसास, रचें आस-पास।

राजा,राजा ठहरे
मरते कटते मोहरे
पीछे मत लौटो यह बंदिश बस पिद्दी पर;
सब कुछ अब जाहिर है
चालों में माहिर है
बदलेगा पाला बस बना रहे गद्दी पर;
अंतस तक बेशर्मी
चस्पा मुँह पर नर्मी
कैसी यह प्यास,बढ़े आस-पास।


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