बुधवार, 28 दिसंबर 2011

शशांक मिश्र भारती की दो कविताएँ - नारी

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नारी और प्रगति

नारी

नर से बढ़कर

कर रही है दायित्‍वों, कर्त्तव्‍य का निर्वहन

एक ही नहीं

तीन-तीन स्‍वरूपों में

कभी पुत्री, कभी पत्‍नी

तो कभी मां के रूप में;

किन्‍तु-

अधिकार, विचार स्‍वातंत्र्य अति संकुचित।

योग देखे तो-

बालकों की पालिता होने से

पुरुषों से दो गुनी,

पर-

चतुर्दिक हो रही

हत्‍या, बलात्‍कार, दहेज, हिंसा का शिकार,

शोषण पर दृष्‍टि डालें

सर्वाधिक हो रहा

नारी के ही किसी न किसी रूप से

स्‍वतंत्रता के

बीते अनेक दशकों के बाद भी,

घोषणाओं-

असंख्‍य कानूनों, स्‍वंयसेवी संस्‍थाओं के

बाद भी

परिणाम ढाक के तीन पात ;

वह चहुँ ओर आतंक ग्रस्‍त

नस दुर्बल

होते अपराध कर भयमुक्‍त,

उठ रहे हैं प्रश्‍न

उत्तर के लिए सन्‍नाटा रात सा

दिशायें भी मौन

देश-इक्‍कीसवीं सदी में,

मेरी समझ में नहीं आता;

जब तक-

भारतीय नारी के अस्‍तित्‍व पर प्रश्‍न चिन्‍ह

उस पर चतुर्दिक से क्षुभित आक्रमण

पलायन भी स्‍वतंत्रता की ओर न हो

यदा-कदा स्‍वच्‍छन्‍दता की ओर।

शक्‍ति स्‍वरूपा को

जाग्रत कर पुनः

स्‍थापित करना पड़ेगा उस स्‍थान पर

जहां से निर्भय हो चल सके

रमन्‍ते तत्रदेवता की उक्‍ति

सार्थक हो

टूटे सदियों का दुष्‍चक्र

समयानुसार पकड़े वह प्रगति के पथ

तभी-

हम, हमारा समाज व राष्‍ट्र

कर सकेंगे सच्‍ची प्रगति

सार्थक दो मानवता के पहियों द्वारा

हां नर और नारी।

--

 

नारी पूजनीय है

मैंने कल पड़ते देखा था

छीटों को एक नारी पर,

कीचड़ के काले धब्‍बों को

श्रेष्ठ पुरुष से परनारी पर।

नारी क्‍या केवल माता है

अबला बनी यह त्राता है,

आश्रिता, दमिता बनी कल से

समाज उंगली उसपे उठाता है।

इक्‍कीसवीं सदी की बातें हम

गौरवान्‍ति हो सबसे करते हैं,

नारी पर अत्‍याचारों के बादल

रह-रह के आंसू बन झरते हैं,

हत्‍या, बलात्‍कार,शोषण के रूप

सर्वस्‍व नारी ही रहती सहती है,

वहशीपन है दानवता हंसती

मानवता खड़ी सिसकती है।

असंख्‍य कानून जागृति संस्‍थायें

भाषण-घोषणायें भी होती हैं,

समान अधिकार की भी बातें

पर बन न सकी यह ज्‍योति है।

यदि दीपक की बाती यह समाज की

नर को काम तेल का करना होगा,

समाज देश, वैभवपूर्ण हो जाये

नारी पूजनीय है कहना होगा॥

--

सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-2424010प्र0

ईमेल- shashank.misra73@rediffmail.com

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