रविवार, 11 दिसंबर 2011

अनीता मिश्रा की कहानी - सेक्रेटरी

 

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'' सर, मैं इंटरव्यू के लिए कितने बजे आ जाऊं?'' जब से उन्होंने नरम और नाज़ुक-सा स्वर फोन पर सुना था, तब से बेहद खुश थे। दरअसल, कई दिन हो गये थे, विज्ञापन दिए हुए, लेकिन कोई "ढंग की" कॉल नही आई थी! आज वे तरह-तरह की कल्पनाओं में डूब गये थे। कैसी होगी? स्वर तो इतना मीठा है, शायद सामने से भी उतनी ही नाज़ुक हो! उनका ऑफिस घर में ही था, इसलिए उन्होंने यहां तक सोच लिया था कि वे ऑफिस कहीं और शिफ्ट कर लेंगे। वरना उनकी शक्की बीवी उनका जीना दूभर कर देगी। कब से वे ख्वाब देख रहे थे कि उनका बिजनस बढे और वे एक खूबसूरत-सी सेक्रेटरी रखें। आख़िर रौब भी तो बढ़ता है सेक्रेटरी होने से! स्टेटस तो बढ़ता ही है।

खैर, वे सुबह से ही तैयार होकर ऑफिस में बैठ गये थे। आज वे एक हैंडसम बॉस दिखना चाहते थे। बेशक वे छिछोरे नहीं थे, पर मर्द तो थे ही। सो, स्त्री के बारे में काल्पनिक कुलांचे तो भर ही सकते थे।

आख़िर वह पल आ ही गया जब उनके कल्पनालोक की सेक्रेटरी उनके सामने थी। उन्होंने पूछा कि वह ये नौकरी क्यों करना चाहती है?

उस लड़की ने बताया कि दो साल पहले शादी हुई थी। पति का पहले से अफेयर था, इसलिए उसने इतनी यातना दी कि घर छोड़ना पड़ा। एक साल का एक बेटा भी है। पिता भी रिटायर हो चुके हैं और अब बीमार होकर बिस्तर पर हैं। ऐसे में उसे अपने दुधमुंहे बेटे को छोड़ कर काम करना ही पड़ेगा।

एसी चालू था, लेकिन उन्होंने रूमाल से अपने माथे पर आया पसीना पोंछा। एक पल के लिए आंखें बंद कीं। पर वे कोई कल्पना नहीं कर पाए!

कुछ ही क्षण बाद उनके मन में खयाल आया कि वे अब एक और विज्ञापन फिर से निकालेंगे।

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(चित्र -  अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com फतुहा पटना की कलाकृति)

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