शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

एस. के. पाण्डेय के हास्य-व्यंग्य दोहे

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।। दोहे।।

भैया ते नर अब नहीं  जो मिलते जब काम।
काम में खोजे न मिलैं ऐसे मनुज तमाम।। 

बचन देत जो फिरत हैं और नहीं भय लाज।
यसकेपी दर-दर मिलैं ये नर भरे समाज।।

हँसत मिलैं बोलैं मधुर बहुत जतावैं प्यार।
यसकेपी तिनमें नहीं सब को साचो यार।।

कुसल छेम बहु पूछते कुसल सुने दुख भार।
यसकेपी नहि झूठ है ऐसे लोग हजार।।

को अपना को गैर है कौन करे कब वार।
यसकेपी नहि जानता सब झूठों व्यवहार।।


राजा रंक मुरख निपुन ऋषि महर्षि सब देव।
यसकेपी मरने चले बचा नहीं जग केव।।

प्रतिपल बदले सरकता सो जानो संसार।
नसोंमुख यहि जगत में प्रेम राम को सार।।   

अहम स्वार्थ अज्ञान बस बन बैठे भगवान।
यसकेपी या जगत में ऐसे बड़े महान।।

साच कहौं नहि झूठ कछु तजौ मान अभिमान।
यसकेपी पहिचानिए जा सेवक हनुमान।।

यसकेपी रघुपति सही बाकी सब है झूठ।
राम न रूठैं होय का जगत जाय जो रूठ।।

ग्रह भूत देवादि जग पूज सरे कछु काम।
अंत समय मुख मोड़ते आते सीताराम।।

जगत विदित सच एक है जगत रहा पर सोय।
यसकेपी देखा-सुना राम नाम सत होय।।

हाय-हाय कर चल बसे शेष रहे बहु काम।
यसकेपी अब का करे भूल गए श्रीराम।।

नाम-दाम लगि पचि मरे हुआ न पर उपकार।
यसकेपी बढ़ता गया जग का यह व्यापार ।।

राम बिना आराम नहि लोग हुये बेराम।
दर-दर सुख खोजत फिरैं खरच रहे बहु दाम।।

राम से चाहैं लोग बहु जग को चाहै राम।
यसकेपी जो चाहता ताहीं को आराम।।

बुरे समय नहि पास को सब मिलते निज काम।
भले-बुरे हर पल मिलैं यसकेपी के राम।।
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डॉ. एस. के. पाण्डेय,
समशापुर (उ.प्र.)।
 
URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/
                *********

(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com , फतुहा, पटना की कलाकृति)

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