शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

एस. के. पाण्डेय का व्यंग्य - एक नेता का स्वप्न

चिम्मनलालजी बड़बड़ा रहे थे- नहीं, नहीं, मुझे माफ़ कर दो, मुझे माफ़ कर दो । उनकी पत्नी ने दौड़कर उन्हें जगाया और बोली सुबह-सुबह किससे माफ़ी माँग रहे हो । चिम्मनलालजी हड़बड़ा कर उठे और बोले एक बहुत ही खराब स्वप्न देख रहा था । उन्होंने स्वप्न सुनाना शुरू किया-

आज मेरे स्वप्न में भारत में ओ हो गया था । जो पिछले साठ वर्षों में नहीं हुआ और न ही आगे होने की सम्भावना हैं । क्योंकि हम लोग ऐसा कभी नहीं होने देंगे ।

भारत में चारों ओर खुशहाली ही खुशहाली दिख रही थी । कोई भी ऐसा घर नहीं था जहाँ रोज चूल्हा न जलता हो । हर जगह अमीरी । गरीबी का नामोनिसान मिट गया था । पिछड़ा और अगड़ा वर्ग की विचारधारा ही समाप्त हो गई थी ।

देश में हर जगह पानी और बिजली की उचित व्यवस्था हो गई थी । हर नागरिक की रोटी, कपड़ा और मकान की सारी जरूरतें पूरी हो गईं थी । हर जगह पक्की रोड थी । झुग्गी-झोपड़ी महलों का रूप ले चुकी थीं । गाँव और शहर की जैसे भिन्नता ही समाप्त हो गई थी ।

बड़े-बड़े अपराधी जो पहले खुलेआम घूमते थे । सब सलाखों के पीछे थे । जिसमें कई नामीगिरामी नेता भी थे । गुंडे-मवाली ऐसे गायब हो गए थे जैसे कुहरे में धूप । हम भागे-भागे फिर रहे थे । नेता हो या अभिनेता किसी को कोई छूट नहीं । आम और नाम में कोई भेद नहीं । सबके साथ एक सलूक । समान अपराध का समान दंड और समान काम का समान वेतन पूरे भारत में लागू था । आम आदमी की परिभाषा ही समाप्त हो गई थी ।

कहीं कोई भ्रष्टाचार नहीं था । कहीं कोई घोटाला नहीं था । कोई घूस का नाम तक नहीं लेता था । क्योंकि ऐसे लोगों के लिए आजीवन कठोर कारावास की व्यवस्था हो गई थी । लोग अब काम की बात करने लगे थे । काम यानी कर्तव्य ही धर्म है । लोग ऐसा सोचने और समझने लगे थे । सारे दफ्तर समय पर खुलने लगे थे । सारे काम समय पर निपटाए जाने लगे थे ।

‘शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा’ की अभूतपूर्व व्यवस्था हो गई थी । कोई रोग से यानी इलाज के अभाव में नहीं मरता था । पास में पैसा न हो तो भी दवा की व्यवस्था थी । दवा और इलाज के नाम पर किसी के रोंगटें खड़े नहीं होते थे । कोई अशिक्षित नहीं था । ऐसी व्यवस्था थी, साथ ही गुरुओं ने अपनी गुरुता फिर से समझनी शुरू कर दी थी ।

अदालतों में वर्षों से पेंडिग मुकदमों का निपटारा हो गया था । न्याय के लिए गुहार का जोर नहीं बल्कि अधिकार का जोर था । अदालतों में भीड़ नहीं दिखती थी ।

पुलिस और अन्यान्य अधिकारी अपने को जनसेवक समझने लगे थे । जनता में इनका कोई डर नहीं रह गया था । बजाय इसके जनता के बीच में इनका घर हो गया था ।

बिदेशों में जमा अकूत काला धन भारत आ गया था । जिन लोगों ने देश में आय से अधिक सम्पत्ति अर्जित कर रखा था । वे लोग एक नए कानून के दायरे में आ जाने के कारण स्वेच्छा से अपने अकूत अवैध धन को देश हित में दे दिए थे ।

जहाँ-तहाँ पोस्टरों और बैनरों में यही लिखा मिलता था-

‘सबको भोजन सबको न्याय । कहीं नहीं कोई अन्याय ।।

धन-दौलत फैली सुख शांति । मिट गई देखों नाना भ्रांति ।।

सबको हक सबको अधिकार । मिलता कहीं न भ्रष्टाचार ।।

मिट गया सारा पापाचार । बढ़ा प्यार-भक्ती का ज्वार’ ।।

इस तरह अमन-चैन और धन-धान्य से सारा भारत परिपूर्ण था । लोग ऐसा कहते और सोचते थे कि आख़िरकार भारत में कुछ हद तक रामराज्य सा राज्य आ ही गया ।

बहुत से महामूर्ख जो रामराज्य से राज्य का इससे अलग यानी दूसरा उल्टा-सीधा मनगढंत अर्थ समझते और समझाते थे । वे मुँख में कालिख लगाकर कहीं डूब मरने के लिए जल खोज रहे थे । लेकिन उनके नसीब में यह भी नसीब नहीं था ।

भारत की यह दशा देखकर हमारे कई साथी चल बसे । मानो पहले से ही तैयार बैठे थे । गाँव-शहर के हर कोने और गली में यही सुनाई देता था कि- “भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा । पूरी हो गई घर की इच्छा” । पहली बार ये शब्द जैसे ही भ्रष्टाचारभूषणजी के कानों में पड़े । उनके प्राण-पखेरू ठीक वैसे ही उड़ गए जैसे कंकड़ फेकने से डाली पर बैठा हुआ पक्षी उड़ जाता है ।

हमनें आनन-फानन में जो बचे थे उन सभी नेताओं की एक इमरजेंसी मीटिंग बुलाई । भारत में छोटे-बड़े जितने भी दल हैं । सबके छोटे-बड़े सभी नेता और कार्यकर्ता उपस्थिति हुए । सभी के आँखों में आँसू थे ।

बड़े-बड़े नेता जो बड़ी-बड़ी बाते करते रहते थे । लच्छेदार भाषण दिया करते थे । संज्ञाशून्य से दिख रहे थे । धीरज धरके हमने बोलना शुरू किया कि बिना मुद्दों के राजनीति नहीं होती है । समस्याओं से ही मुद्दे बनते हैं । अब जब समस्याएं ही नहीं हैं तो क्या खाक राजनीति होगी ?

अब तो हम और राज्य भी नहीं बना सकते । क्योंकि भारत विश्व का ऐसा देश हो गया है जहाँ कोई जिला नहीं है । सारे जिले राज्य बन गए हैं ।

ये सब कैसे हो गया ? किसने कर दिया ? अब हम लोगों का क्या होगा ? हम कौन सा मुँह लेकर चुनाव के समय जनता के सामने जाएंगे । उनसे वायदा करने के लिए हमारे पास क्या बचा है ? हम लोग यही सब चर्चा कर रहे थे । इतने में वहाँ एक आवाज सुनाई देने लगी । जो कह रही थी-

अरे हत्यारों तुम सब अपने वायदों के मकड़जाल में भोली-भाली जनता को सदैव के लिए फसाए रखना चाहते थे । आज जब देश की सारी समस्याएं समाप्त हो गईं हैं । तब खुश होने के स्थान पर तुम रो-रोकर मरे जा रहे हो । क्या समझते हो कि खुशहाल जनता वोट नहीं देगी ? इसीलिए इन्हें समस्याओं में उलझाये रहते हो । प्लानिंग करके नई-नई समस्याओं को जन्म देते हो । और खुद उन्हें समाप्त करने के लिए सब मिलकर राजनीति करते हो । समस्याओं का दूसरा नाम ही राजनीति समझते हो । खुद ऐश और निबेश करते हो और जनता की दुर्दशा का तमाशा देखते हो । तुम सब नर्क में अवश्य जाओगे । तुम सब नर्क में अवश्य जाओगे-

“जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी । सो नृप अवसि नरक अधिकारी” ।।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.) ।

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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1 blogger-facebook:

  1. नेता जी का सुंदर सपना,...काश ऐसा होता
    सुंदर आलेख,...

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