संजय कुमार की कविता - पेड़

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पेड़ लगाओ

आने वाले कल की खातिर,

कुछ देर बैठने का,

ठांव बनाया है,

मैंने भी एक पेड़ लगाया है ।

 

तपते जेठ की दुपहरी में,

सूरज भी ढूंढेगा छांव,

जलेंगें जब बादल के पांव,

आ जायेंगे फिर,

दौड़कर वो

सबके लिए है मेरा गांव ।

 

क्‍योंकि,

कुछ देर बैठने का,

ठांव बनाया है,

मैंने भी एक पेड़ लगाया है ।

 

चिड़िया, तोता और गिलहरी

कोयल, मोर, पपीहा प्‍यारे,

कौआ, चील गिध्‍द भी सारे,

ढूंढ रहे है ऐसा गांव,

क्‍योंकि,

कुछ देर बैठने का,

ठांव बनाया है,

मैंने भी एक पेड़ लगाया है ।

 

धरती तपती - तपता आकाश,

विश्‍व गर्मीमें जल-जलकर ,

ओजोन' का भी हो रहा हास,

मेरा एक अकेला गांव,

कैसे सब को देगा छांव,

आओ सब यह भार उठाओ,

एक-एक पेड़ सभी लगाओ ।

 

--

संजय कुमार

वास्ते भारतीय खाद्य निगम 

खाद्य संग्रहण आगार

हनुमानगढ़ टाउन राजस्थान

 

335513 

--

(चित्र - फोटो - रवि-रतलामी)

3 टिप्पणियाँ "संजय कुमार की कविता - पेड़"

  1. sunder rachan prkirti k bilkul Aas-pas.sadhu-vad

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  2. बेनामी7:02 pm

    क्या तुझे मेरी याद न आई?
    पल को भी कोई बात न सताई?
    की कोई दूर याद करता होगा
    हाए! यह कैसी रुसवाई

    ... बहुत याद करते है आज भी
    उतना ही डरते आयी आज भी
    एक बार तूने पुकारा तो होता
    मैं तो बिन कहे ही चले आई

    लब मेरे तपते है लाबो पे
    तेरी एक झलक को तडपे है मॅन
    कोई खुवब देखा तो होगा
    मेरी ससों तो तेरी खुसबू है आई

    आजा पिया लग जा गले
    और आब यूह न सता
    यादों में तेरी गुम्सुम मैं
    मैं तेरी यादें और मेरी तन्हाई

    उत्तर देंहटाएं

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