शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

अनुराग तिवारी की कविता - जिन्दगी

ज़िन्‍दगी

ज़िन्‍दगी है चार दिन की,

लोग कहते,

बहुत होते हैं मगर -

ये चार दिन भी।

 

युग समा जाते पलों में हैं -

यहाँ;

आपदाएँ घेर लें जब -

ज़िन्‍दगी ।

ज़िन्‍दगी है चार दिन की लोग कहते।

 

दर्द की तनहा अमां में जब -

कभी,

नूर के हर एक कतरे के लिए,

बेकसी से टूटता इंसाँ यहाँ,

भटकनों औ‘ ठोकरों की-

नेमतें ले,

गवाँ देता चार दिन जब

ज़िन्‍दगी के

बहुत लगते हैं तभी

ये चार दिन भी ।

ज़िन्‍दगी है चार दिन की लोग कहते।

 

रह यहाँ जाते मगर -

अफ़सान-ए कुछ,

कुछ फ़ज़ाओं में गिला बच,

शेष रहती;

समय की रेती पै -

कुछ नक्‍श्‍ो कदम

औ' गुनाहों का सबब भी

शेष रहता;

तब ख़यालों को

चुभन की टीस दे दे,

बढ़ा देते हैं सभी मिल -

ज़़िन्‍दगी।

ज़िन्‍दगी है चार दिन की लोग कहते,

बहुत होते हैं मगर ये चार दिन भी।

--

-सी ए. अनुराग तिवारी

5-बी, कस्‍तूरबा नगर,

सिगरा, वाराणसी- 221010

--

संक्षिप्‍त परिचय

नाम ः अनुराग तिवारी

पिता का नाम ः स्‍व. राम प्‍यारे तिवारी

माता का नाम ः स्‍व. सुशीला देवी

जन्‍म तिथि ः 09.05.1970

जन्‍म स्‍थान ः हमीरपुर, उ.प्र.

शिक्षा ः शिक्षा वाराणसी में हुई। काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय से बी. काम. उत्‍तीर्ण

करने के बाद चार्टर्ड एकाउन्‍टेन्‍सी की परीक्षा उत्‍तीर्ण की और तब से

बतौर सी. ए. प्रैक्‍टिस कर रहा हूँ।

लेखन ः साहित्‍य के प्रति मेरी रुचि बचपन से ही रही है और तभी से कविताएँ

लिखता आ रहा हूँ। मेरी कविताएँ कई पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो

चुकी हैं।

2 blogger-facebook:

  1. बिलकुल, दुःख भरे चार दिन भी बहुत बड़े लगते हैं.युगों की तरह.

    उत्तर देंहटाएं
  2. कविता अच्छी है। क्या आपके पिताश्री मऊ-भंजननाथ रहते थे?
    *महेंद्रभटनागर
    फ़ोन : 0751-4092908

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------