शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

रतन चंद ‘रत्‍नेश' की लघुकथा - प्रेरणा

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बाल-शोषण पर उन्‍होंने एक बहुत अच्‍छी जागरुकतापूर्ण पुस्‍तक लिखी। इस पुस्‍तक को लिखने कि लिए उन्‍होंने परिश्रम भी यथेष्‍ट किया। कई आंकड़े इकट्‌ठे किये, कई पहलुओं को छुआ। मेहनत रंग लायी और पुस्‍तक पुरस्‍कृत हुई।

मैं उन्‍हें शुभकामनाएं देने उनके निवास पर पहुंचा। साथ ही मैं यह भी जानने को उत्‍सुक था कि उन्‍हें यह पुस्‍तक लिखने की प्रेरणा कहां से मिली ?

ज्‍योंहि मैं उनके घर के समीप पहुंचा तो अंदर से चीख-पुकार की आवाजें आ रही थीं।

‘‘एक तो कप-प्‍लेट तोड़ दिये, ऊपर से नौकरी छोड़ने की धौंस दिखाता है हरामखोर। छोटे साहब ने दो थप्‍पड़ मार दिये तो क्‍या हो गया ?'' लेखक की पत्‍नी गरज रही थी।

अंदर से बाल-नौकर के रोने की आवाज आ रही थी।

‘‘ओफ्‍फो, तुमलोगों ने यह क्‍या नाटक मचा रखा है ? कम-से-कम एक-दो महीने इस बेचारे को तो कुछ न कहो। तब तक मेरी पुरस्‍कृत पुस्‍तक की चर्चा भी थम जाएगी।'' लेखक की आवाज थी।

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(चित्र - अमरेन्द्र - aryanartist@gmail.com फतुहा, पटना की कलाकृति)

6 blogger-facebook:

  1. कल शनिवार ... 03/12/2011को आपकी कोई पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  2. आपसे निवेदन है इस पोस्ट पर आकर
    अपनी राय अवश्य दें -
    http://cartoondhamaka.blogspot.com/2011/12/blog-post_420.html#links

    उत्तर देंहटाएं
  3. divaalon ke bhee kan hote hain, ek asaliyat saamane aaee. ati sundar

    उत्तर देंहटाएं
  4. bahut badi sacchaee bayan ki hai ratnesh ji ne laghukatha me ... badhaee .. sundar abhivyakti saral, sahaj shabdon me ..

    उत्तर देंहटाएं
  5. sachchai ki yoon ujagar kiya ki wo bhi sharm se pani pani ho jaye....bahut badhia prastuti

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  6. बहुत ही सुंदर और सटीक ,आपने इस समाज को आइना दिखा दिया है सर |

    उत्तर देंहटाएं

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