बुधवार, 28 दिसंबर 2011

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की कविता - वे ही पल पल तोड़ा करते

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वे ही पल पल तोड़ा करते

सुबह शाम और जब जी चाहा
मंदिर मस्जिद जाते लोग
ईश्वर को देते हैं धोखा
अल्लाह को भरमाते लोग।

दिन तो छल छंदों में बीता
रातें काटीं मस्ती में
फिर भी सड़कों पर मिल जाते
भजन कीर्तन गाते लोग।

पहले तो अंतरमन से
आंखों का परदा होता था
अब तो खुलकर खाने में भी
कहीं नहीं शरमाते लोग।

दिन दिन बढ़ती जातीं
अरमानों की भूखी लाशें
चारों ओर मिला करते हैं
अपने को गरमाते लोग।

मतलब की भूखी मंडी में
ईमानों की कहां कदर
पता नहीं क्यों घूमा करते
दिल लाते ले जाते लोग।

हाथ मिला कर गला काटना
ये तो सबने सीखा है
पता नहीं क्यों खुश होते हैं
अपनी नाक कटाते लोग।

बेशरमी और बेरहमी
के नंगे तांडव होते हैं
लाज भले ही शरमा जाये
किंतु नहीं लजाते लोग।

कुछ‌ छ लोगों ने प्रजातंत्र की
बागडोर है थाम रखी
जब भी चाहा जैसे चाहा
सबको यही नचाते लोग।

असली चेहरे तो कहने के
सब पर लगे मुखौटे हैं
कहते कुछ हैं करते कुछ हैं
बस गिरगिट बन जाते लोग।

झूठ बोलना धरम‌ हो गया
वेद पुराण हुये पाखंड
खुदको सच्चा और गेरों को
झूठा ही बतलाते लोग।

नियम कायदे तो कहने को
ढेरों लिखे किताबों में
वे ही पल पल तोड़ा करते
जो कानून बनाते लोग।

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