रविवार, 11 दिसंबर 2011

मंजरी शुक्ल की कविता - अगर मैं पेंट होती

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अगर मैं पेंट होती

तो रंगती तुम्हें अपने रंग में,

अनछुए सपनों को छू लेती

तुम्हें बाहों में भरकर

चुपके से कहती

"लाल" हो जाओ

तुम शरमाकर लाल हो जाते,

अगर मैं पेंट होती

तो तुम्हारे गालों को सहलाकर

हौले से हंसती और कहती

"नीला" फिर आसमान तक देखती

 

तुम्हारा वजूद जिसमे मैं बारिश

में भीगी नन्ही चिड़िया

के सामान फुदकती

और हँसकर कहती "हरा"

फिर हम दूर दूर तक

खेत खलियान बन जाते

 

एक हो जाते इस धरा

से अम्बर तक जहाँ हम

जाते क्षितिज के आगे

कई अनकहे रंग जब मुझे

समझ न आते तो तुम कहते

सारे "रंग" मिला दो ना

और तुम इन्द्रधनुष बन जाते

जब तपती धरती सी में

प्यास से व्याकुल होती

तो तुम मेघ संग आते

रिमझिम वर्षा कर

प्रणय गीत गाते

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