बुधवार, 28 दिसंबर 2011

रघुनन्‍दन प्रसाद दीक्षित प्रखर की कविता व पुस्तक समीक्षा

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(कुंडलियां)

नथ

नथ की अकथ कहानियां ,रच डाले इतिहास।

कभी रही चित चोरनी, कभी हास परिहास॥

कभी हास परिहास बहुमुखी किलोलें करे चिबंक पर।

मूंगा मोती मकर आकृति अंगना ज्‍यों खग लागे पर॥

'प्रखर' हिलोरें उर अर्न्‍त में जैसे काम चढा हो रथ।

इतिहास बन गयी मंहगाई में हाय फैशन मारी नथ॥

 

जीवन का रण

आखिर

सब्र का इम्‍तिहान

लेंगे कब तक

अर्न्‍त व्रण,

तल्‍ख तकरीर

का सबब

बन गये आज वही क्षण,।

सुकून की

जिन्‍दगी दुश्‍वार

लगती

या फिर यूँ कह लें

जिन्‍दगी के फलक पर

अमर्ष में बिंधा कण कण,॥

क्‍या पैसे का कद

मानवता से बडा हो गया,

दौलत की चमक में

कहीं अपने होने का

अस्तित्व खो गया,

नहीं चाहिए,

ढेरों सुख सुविधा खुशियां

ढलती शाम में

चाहिए मात्र सुकून का क्षण॥

जैसा पहले था

आज भी वैसा ही

पहले भी खाली आज भी

जब कुछ नहीं तो डर कैसा......?

डर यही मीत !

परास्‍त न कर दे

जीवन रण॥

सूर्य का तेज

निशीथ की चांदनी

कहां शास्‍वत

विभव होता निश्‍चित

करता वह आश्‍वस्‍त

'प्रखर' शक्‍तियों में

रह जायेगी केवल हड बड॥

 

बिना शुल्‍क

बिना शुल्‍क के

कुछ नहीं मिलता

पेट काटकर

मुफ्‍त खा रहे,

पकड़े पीछे

जेल जा रहे,

वक्‍त किसी का

हुआ कभी क्‍या

दांव लगा तो निश्‍चित छलता॥

 

पैरों में स्‍वर्ग

जिसके कारण

संज्ञा चहके

स्‍वर्ग उसी के पैरों में।

करती नित्‍य

परास्‍त दुःखों को,

चादर नहीं

बनाए सुखों को ,

फटे हाल बेहाल

वही अब

गैरत कंह उन बेगैरों में॥

(पुस्‍तक समीक्षा)

काव्‍य रश्‍मि की आभा : काव्‍यकांति

गद्य का सृजन तो चिंतन ,पठन,विमर्श अर्थात मस्तिष्क की उपज है,जबकि पद्य हृदय में तिरोहित होती संवेदनाओं व्‍यथा,पीडा के दंश से आहत की खनक ,अल्‍हाद अनुभूति से अभ्‍युदित हुआ उद्‌गार का लावा है जो शब्‍दों में ढलकर कागद पर सरकार होता है। वस्‍तुतः सच्ची कविता वही है जो हृदय से सम्‍वेत उद्धृत हो । इसी की सार्थक परिणीत श्री कांत अकेला कृत काव्‍यकांति है जिसे रश्‍मि प्रकाशन नाहन (हि0प्र0) ने प्रकाशित किया है। यद्यपि कवि का प्रथम प्रयास है परन्‍तु युवा उमंगों की हिलोरें कुछ कर गुजरने का भाव पृष्‍ठ दर पृष्‍ठ कविता को चरम तक ले जाने का प्रयास करता है। जिसमें आशान्वित सोच,प्रणति निवेदन ,प्रेम का अंकुरण, तो वहीं कवि के विद्रोही स्‍वरुप्‍ के भी पाठक का सामना होता है।

यथा ः-

कब तक माँ भूखे बिलखते बच्‍चों को

दिलासा देने के लिए

कच्‍चा पानी उबालती रहेगी ?

शासन ,सियासत और प्रशासन में भ्रष्‍टाचार के साथ मानो चोली दामन का साथ है। इस मुद्‌दे को कृतिकार ने बखूबी उठाया है। चूंकि कवि अकेला जन्‍मभूमि और कर्मभूमि की मनोहारी प्रकृति से निकट का संबंध है। उसका मन र्प्‍यावरणीय चिन्‍ता से त्रस्‍त है। उसे टिहरी बांध में जल समाधि बने टिहरी नगर के साथ उसकी लोक संस्‍कृति ,इतिहास,सभ्‍यता भी जल में विलीन हो गये। आधुनिकता एवं विकास का प्रलयंकारी रुप वीभत्‍स और भयानक भी है।

समग्रतः कवि का प्रयास सार्थक है। यदि कवि अकेला मात्रिक व्‍याकरण की त्रुटियों का विशेष ध्‍यान रखते कृति का रुप और निखरता ।आशा है कृतिकार भविष्‍य में दन बिन्‍दुओं पर गौर करेंगे। पुस्‍तक पठनीय एवं संग्रहणीय है।

--

कृति ः काव्‍यकांति

मूल्‍य ः 120 रुपए

प्रकाशक ः रश्‍मि प्रकाशन नाहन (हि0प्र0)

समीक्षक

रघुनन्‍दन प्रसाद दीक्षित प्रखर

शांतिदाता सदन,

नेकपुर चौरासी

फतेहगढ (उ0प्र0) पिन209601

ईमेल:

Dixit4803@rediffmail.com

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